अपने आंचल को परचम बनातीं इन महिला मंत्रियों की तस्वीर गवाह है बदलते हिंदुस्तान की ModiCabinetExpansion womenempowerment
देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग प्रकार की साड़ियां प्रचलित हैं। अगर आप उत्तर भारत से दक्षिण की ओर रुख करेंगे तो आप पाएंगे कि वहां चौड़े बॉर्डर की और सिल्क की साड़ियां मिलेंगी। अगर आप ईस्ट की तरफ जाएंगे तो वहां पर आपको दूसरे प्रकार की साड़ी देखने को मिलेगी।तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन, तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था। असरार-उल-हक़ मजाज़ का ये शेर बेहद मशहूर है। मज़ाज़ ने यह शेर उस आधी आबादी के लिए लिखा जिसकी सरहद आज भी कुछ हद तक रसोई तक ही सीमित होती है। वो कहते हैं...
बेहद पुराना है। अगर आप रामायण, महाभारत को देखेंगे तो आप उसमें भी इसी साड़ी को धारण किए, आभूषणों से लदी हुईं महिलाएं दिखेंगी।भारतीय विरासत की निशानी मानी जाने वाला यह परिधान प्राचीन समय से ही स्त्रियों की पसंद रहा है। साड़ी भारतीय नारी की सादगी, सरलता, सम्मान एवं शीतलता का प्रतीक माना जाता है। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से ही मूर्तियों में उकेरी गई महिलाओं की आकृतियों में स्त्रियों के कमर के ऊपर वाले सामने एवं पैरों के हिस्से को साड़ी के जरिए ढका हुआ दिखाया गया है। यह इस बात का प्रतीक है कि साड़ी...
भौगोलिक स्थिति, पारंपरिक मूल्यों और रुचियों के अनुसार बाज़ारों में साड़ियों की असंख्य किस्में उपलब्ध हैं। अलग-अलग शैली की साड़ियों में कांजीवरम साड़ी, बनारसी साड़ी, पटोला साड़ी और हकोबा मुख्य हैं। मध्य प्रदेश की चंदेरी, महेश्वरी, मधुबनी छपाई, असम की मूंगा रेशम, उड़ीसा की बोमकई, राजस्थान की बंधेज, गुजरात की गठोडा, पटौला, बिहार की तसर, काथा, छत्तीसगढ़ी कोसा रेशम, दिल्ली की रेशमी साड़ियाँ, झारखंडी कोसा रेशम, महाराष्ट्र की पैथानी, तमिलनाडु की कांजीवरम, बनारसी साड़ियाँ, उत्तर प्रदेश की तांची,...