इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में अफसरशाही के लिए स upरियर रिस्पांसिबिलिटी सिद्धांत लागू करने और वरिष्ठ अफसरों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराने के लिए मुख्यमंत्री से अपेक्षा की। कोर्ट ने बरेली के व्यक्ति की याचिका पर संवेदनशील निर्णय लिया और अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करने का आदेश दिया। मनीष कुमार सिंह मामले के आदेशों के अनुपालन की जांच की और संस्थागत पतन के दो रूपों पर प्रकाश डाला।
अब वक्त आ गया है जब बड़े अफसरों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। इस विषय पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से अफसरशाही में ' सुपीरियर रिस्पांसिबिलिटी'( उच्च जिम्मेदारी) सिद्धांत अपनाने की अपेक्षा की है। कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ अफसरों को उनके अधीनस्थों की गलतियों के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। यह निर्णय बरेली के व_yaxis व्यवसायी अवनीश कुमार अग्रवाल की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। कोर्ट ने एक विशेष न्यायाधीश के आदेश को निरस्त करते हुए अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया। क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण बरेली को याची के पक्ष में पासपोर्ट जारी या नवीनीकृत करने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने राज्य सरकार की तरफ से कहा गया कि आरोप गंभीर हैं, लेकिन पीठ ने कई सवाल उठाए। मनीष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में 2023 के हाईकोर्ट के आदेश का जिक्र किया गया, जिसमें राज्य सरकार को भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी वाली एफआईआर की जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति बनाने और सरकारी विभागों में दर्ज प्राथमिकियों की जांच जल्दी पूरी करने का निर्देश था। राज्य सरकार ने कहा कि 29 नवंबर 2023 के आदेश के अनुपालन में 9 दिसंबर 2025 को उच्च स्तरीय समिति बनाई गई है, जिसमें मुख्य सचिव अध्यक्ष हैं और अन्य सचिव, पुलिस महानिदेशक भी शामिल हैं। कोर्ट ने पाया कि मनीष कुमार सिंह केस में दिए गए निर्देशों का अनुपालन विलंबित और आंशिक रहा है। कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव से कहा कि वह कोर्ट के आदेश को सीधे मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत करें। कोर्ट ने सुझाव दिया कि वरिष्ठ अफसरों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके अधीनस्थ भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, रिकार्ड दबाने या सरकारी आदेशों का उल्लंघन न कर रहे हों। यदि वे नकाम रहते हैं तो उन्हें आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। यह सिद्धांत सैन्य कमांड की जिम्मेदारी जैसा है। कोर्ट ने संस्थागत पतन के दो रूपों की चर्चा की: एक 'मन का भ्रष्टाचार' जहां निजी स्वार्थों के लिए निर्णय प्रक्रिया विकृत होती है, और 'पैसे का भ्रष्टाचार' जहां सार्वजनिक पद व्यक्तिगत आर्थिक लाभ का जरिया बन जाता है। याची अवनीश कुमार अग्रवाल ने कहा कि उनके खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गई हैं, एक में जांच लगभग दो दशक से लंबित है और दूसरी में 18 वर्षों की देरी के बाद 2024 में आरोप-पत्र दाखिल किया गया। याची के खिलाफ 18 साल पहले बिजनौर के नजीबाबाद और मंडावली थानों में एफआईआर दर्ज की गई थीं, जिनमें वाणिज्य कर अफसरों के साथ मिलकर दस्तावेज जलाने के आरोप थे। हाईकोर्ट की कोआर्डिनेशन बेंच ने याची के खिलाफ चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी थी और अगली सुनवाई तक फोटोग्राफर की गिरफ्तारी पर भी रोक लगाई। कोर्ट ने चार सप्ताह में जवाबी हलफनामा मांगा.
अब वक्त आ गया है जब बड़े अफसरों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। इस विषय पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से अफसरशाही में 'सुपीरियर रिस्पांसिबिलिटी'( उच्च जिम्मेदारी) सिद्धांत अपनाने की अपेक्षा की है। कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ अफसरों को उनके अधीनस्थों की गलतियों के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। यह निर्णय बरेली के व_yaxis व्यवसायी अवनीश कुमार अग्रवाल की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। कोर्ट ने एक विशेष न्यायाधीश के आदेश को निरस्त करते हुए अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया। क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण बरेली को याची के पक्ष में पासपोर्ट जारी या नवीनीकृत करने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने राज्य सरकार की तरफ से कहा गया कि आरोप गंभीर हैं, लेकिन पीठ ने कई सवाल उठाए। मनीष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में 2023 के हाईकोर्ट के आदेश का जिक्र किया गया, जिसमें राज्य सरकार को भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी वाली एफआईआर की जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति बनाने और सरकारी विभागों में दर्ज प्राथमिकियों की जांच जल्दी पूरी करने का निर्देश था। राज्य सरकार ने कहा कि 29 नवंबर 2023 के आदेश के अनुपालन में 9 दिसंबर 2025 को उच्च स्तरीय समिति बनाई गई है, जिसमें मुख्य सचिव अध्यक्ष हैं और अन्य सचिव, पुलिस महानिदेशक भी शामिल हैं। कोर्ट ने पाया कि मनीष कुमार सिंह केस में दिए गए निर्देशों का अनुपालन विलंबित और आंशिक रहा है। कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव से कहा कि वह कोर्ट के आदेश को सीधे मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत करें। कोर्ट ने सुझाव दिया कि वरिष्ठ अफसरों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके अधीनस्थ भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, रिकार्ड दबाने या सरकारी आदेशों का उल्लंघन न कर रहे हों। यदि वे नकाम रहते हैं तो उन्हें आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। यह सिद्धांत सैन्य कमांड की जिम्मेदारी जैसा है। कोर्ट ने संस्थागत पतन के दो रूपों की चर्चा की: एक 'मन का भ्रष्टाचार' जहां निजी स्वार्थों के लिए निर्णय प्रक्रिया विकृत होती है, और 'पैसे का भ्रष्टाचार' जहां सार्वजनिक पद व्यक्तिगत आर्थिक लाभ का जरिया बन जाता है। याची अवनीश कुमार अग्रवाल ने कहा कि उनके खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की गई हैं, एक में जांच लगभग दो दशक से लंबित है और दूसरी में 18 वर्षों की देरी के बाद 2024 में आरोप-पत्र दाखिल किया गया। याची के खिलाफ 18 साल पहले बिजनौर के नजीबाबाद और मंडावली थानों में एफआईआर दर्ज की गई थीं, जिनमें वाणिज्य कर अफसरों के साथ मिलकर दस्तावेज जलाने के आरोप थे। हाईकोर्ट की कोआर्डिनेशन बेंच ने याची के खिलाफ चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी थी और अगली सुनवाई तक फोटोग्राफर की गिरफ्तारी पर भी रोक लगाई। कोर्ट ने चार सप्ताह में जवाबी हलफनामा मांगा
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