मार्च के आखिरी तक दुनिया के तमाम देशों ने लॉकडाउन लागू कर दिया पर स्वीडन में पार्क, बार, रेस्त्रां और स्कूल खुले रहे
दुनियाभर में कोरोना वायरस की चपेट में अब तक 55 लाख से अधिक लोग आ चुके हैं, जबकि 3.46 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. इस खतरनाक वैश्विक महामारी से निपटने के लिए लॉकडाउन और टेस्टिंग को सबसे बड़ा हथियार माना गया, लेकिन स्वीडन ने इस महामारी के संकट को देखते हुए भी लॉकडाउन घोषित नहीं किया.
यहां सबसे बड़ी चिंता मौतों को लेकर है. स्वीडन की आबादी मुंबई की तुलना में कम है, लेकिन यहां 10,000 ज्यादा केस सामने आए हैं और मौतें चौगुनी हुई हैं. लगभग 4,000 मौतों के साथ, स्वीडन की दुनिया में Covid-19 से प्रति व्यक्ति मृत्यु दर छठे नंबर पर है- हर दस लाख पर 384. लेकिन पिछले सात दिनों की बात की जाए तो 342 मौतों के साथ, स्वीडन में प्रति व्यक्ति मृत्यु दर दुनिया में सबसे अधिक रही है.
इंडिया टुडे के न्यूज ट्रैक प्रोग्राम में स्वीडन के Karolinska Institute की प्रोफेसर Cecilia ने कहा कि स्वीडन में इधर हालात बिगड़ने लगे हैं. इस खतरनाक वायरस से निपटने के लिए हमारी तैयारी अच्छी नहीं रही. सोशल डिस्टेंसिंग को लेकर भी बड़े पैमाने पर अवेयरनेस कैंपेन चलाया जाना चाहिए था. कई साइंटिस्ट और डॉक्टरों ने देश में लॉकडाउन की बता कही थी, लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि अवेयरनेस और टेस्टिंग के जरिए ही इससे मुकाबला किया जा सकता है.Prof.
वहीं स्वीडिश सरकार बोलसोनारो जैसे धुर दक्षिणपंथी नेताओं जैसे लॉकडाउन को लोगों की निजी आजादी पर हमला नहीं मानती, बल्कि वो इसे अवैज्ञानिक और निरर्थक उपाय के तौर पर देखती है. न्यूज ट्रैक प्रोग्राम में ब्राजील के Epidemiologist प्रोफसर Mauro Sanchez ने माना कि सरकार की गलत रणनीति के चलते देश में ऐसे हालात हुए हैं. इसे सरकार को गंभीरता से लेना होगा और ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग पर फोकस करना होगा.
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