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दुनिया की सबसे तगड़ी दुश्मनी को भारत ने कैसे थामा है? इजरायल से दोस्ती भी फिलिस्तीन का साथ भी, समझिए फंडा

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दुनिया की सबसे तगड़ी दुश्मनी को भारत ने कैसे थामा है? इजरायल से दोस्ती भी फिलिस्तीन का साथ भी, समझिए फंडा
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पीएम नरेंद्र मोदी आज 9 साल के बाद इजरायल की धरती पर दो दिनों के लिए पहुंचे हैं. दुनिया की सबसे तगड़ी दुश्मनी के बीच भी भारत ने दोनों देशों को थाम रखा है. अपने खास दोस्त इजरायल से दोस्ती को बरकरार भी रखा है और दूसरी तरफ फिलिस्तीन का साथ भी नहीं छोड़ा है.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज इजरायल की धरती पर पहुंच गए. 9 साल के बाद दो दिनों के दौरे पर इजरायल पहुंचे पीएम मोदी ने भारत की दशकों पुरानी हिचकिचाहट को खत्म करते हुए दोनों देशों के बीच मजबूत और भरोसेमंद रिश्ते की नींव के तौर पर देखा जा रहा है.

भारत की तरफ से यहूदियों की धरती पर कदम रखने वाले पहले पीएम बने मोदी दूसरी बार यह इतिहास रच रहे हैं. इस बार खास यह भी है कि पीएम वहां पर इजरायली संसद नेसेट को संबोधित करने के साथ ही होलोकास्ट स्मारक का दौरा भी करेंगे. दोनों देशों के बीच संबंध अब हथियारों के व्यापार से काफी आगे बढ़कर टेक्नॉलजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, स्पेस टेक्निक तक पहुंच गया है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया पर ‘शालोम इजरायल! लिखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भव्य स्वागत का ऐलान किया है. पीएम मोदी का यह इजरायल दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब वेस्ट बैंक पर तनाव काफी ज्यादा बढ़ गया है, जिसे लेकर भारत की कूटनीति के लिए एक ‘बैलेंसिंग ऐक्ट’ यानी संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौती है. अब खास बात यह है कि दुनिया की सबसे तगड़ी दुश्मनी के बीच भी भारत ने दोनों देशों को थाम रखा है. अपने खास दोस्त इजरायल से दोस्ती को बरकरार भी रखा है और दूसरी तरफ फिलिस्तीन का साथ भी नहीं छोड़ा है. दोनों देशों के बीच दुश्मनी की नींव पड़ने से लेकर अभी के मौजूदा दौर की स्थिति में भारत की विदेशी कूटनीति को समझते हैं. मोदी से पहले भारत-इजरायल संबंध पश्चिम एशिया को लेकर भारत देश की शुरुआती नीति उसके औपनिवेशिक अनुभव और फिलिस्तीनी संघर्ष के प्रति सहानुभूति से प्रभावित रही. ब्रिटिश शासन के दौरान तत्कालीन भारत ने 1917 की बैलफोर घोषणा का विरोध किया, जिसमें फिलिस्तीन की धरती पर यहूदियों के लिए अलग से देश का समर्थन किया गया था. इसके बाद 1947 में अंग्रेजों से आजादी मिल जाने के बाद भारत ने संयुक्त राष्ट्र के विभाजन प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया, जो अलग-अलग यहूदी और अरब राज्यों की बात करता था. साल 1949 में भी इजरायल की संयुक्त राष्ट्र सदस्यता के खिलाफ भारत ने वोट दिया था. पीएम मोदी को र‍िसीव करने पहुंचे नेतन्‍याहू की ब्‍लू टाई का राज क्‍या? क्‍यों होती है उनके कपड़ों पर इतनी चर्चा हालांकि भारत ने 1950 में इजरायल को मान्यता दे दी थी, लेकिन 1992 तक उसके साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए. एक समय भारतीय पासपोर्ट पर ‘इजरायल की यात्रा के लिए मान्य नहीं’ लिखा हुआ लिखा रहता था. इसके बावजूद 1960 के दशक से पर्दे के पीछे का सहयोग शुरू हो चुका था. चीन और पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों के दौरान भारत को इजरायल से सैन्य सहायता और हथियार मिले. शीत युद्ध की समाप्ति और 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत ने 1992 में इजरायल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए. नई दिल्ली और तेल अवीव में दूतावास खोले गए. यह भारत की विदेश नीति की दिशा में एक अहम पड़ाव था. साल 1990 और 2000 के दशक में रक्षा व्यापार, सियासी और तकनीकी सहयोग बढ़ा, लेकिन संबंध मुख्यतः लेन-देन पर ही आधारित थे. साल 1968 और 2003 में इजरायल के दो प्रधानमंत्रियों ने और साल 1996 और 2016 में दो राष्ट्रपतियों ने भारत का दौरा किया था. इसके अलावा आधिकारिक दौरा कभी-कभार ही होता था. पूर्ण रणनीतिक साझेदारी का स्वरूप मोदी युग में सामने आया. मोदी युग में आखिर क्या बदला? जुलाई 2017 में पीएम नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा ने द्विपक्षीय संबंधों को ‘रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक पहुंचा दिया. सहयोग के दायरे में रक्षा के साथ-साथ जल प्रबंधन, कृषि, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष रिसर्च, इनोवेशन और स्टार्टअप साझेदारी शामिल हुई. 2018 में नेतन्याहू की भारत यात्रा ने हाई लेवल राजनीतिक संवाद को संस्थागत रूप दे दिया. साइबर सुरक्षा, तेल-गैस, नागरिक उड्डयन और आंतरिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में कई सारे समझौते हुए हैं. डिफेंस: साझेदारी की मजबूत कड़ी रक्षा व्यापार ही भारत और इजरायल के संबंधों का सबसे ठोस आधार रहा है. 2012 से 2024 के बीच के कई सालों में इजरायल, भारत के टॉप 3 डिफेंस आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा. भारत ने बराक-8 सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली, फाल्कन AWACS रडार, स्पाइडर वायु रक्षा प्रणाली, हेरॉन UAV, हारोप और हार्पी लोटरिंग म्यूनिशन तथा स्पाइक एंटी-टैंक मिसाइल जैसी सिस्टम को खरीदा. 2020 से 2024 के बीच रक्षा व्यापार और तकनीकी सहयोग की अनुमानित लागत 20 अरब डॉलर से अधिक की बताई जाती है. लेजर आधारित रक्षा प्रणाली और बैलिस्टिक मिसाइल टेक्निक में भी सहयोग की चर्चा है. 2500 साल पहले ‘120’ ऋषियों के आधार पर बनी है इजरायल की संसद नेसेट, इससे ज्यादा या कम नहीं होते लोग व्यापार और निवेश कितना? साल 1992 में लगभग 20 करोड़ डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार 2024-25 तक बढ़कर 3.75 अरब डॉलर से अधिक का हो गया. हीरे, कीमती पत्थर, पेट्रोलियम उत्पाद, रसायन, मशीनरी और तकनीकी उपकरण व्यापार का प्रमुख हिस्सा है. सितंबर 2025 में दोनों देशों ने द्विपक्षीय निवेश समझौते पर हस्ताक्षर किए. 2025 के अंत में मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत औपचारिक रूप से शुरू हुई, जिसे भविष्य के आर्थिक एकीकरण की दिशा में ‘ऐतिहासिक’ कदम करार दिया गया. फिलिस्तीन पर भारत का संतुलन रणनीतिक निकटता के बावजूद भारत दो-राष्ट्र समाधान और फिलिस्तीनी संप्रभुता को सपोर्ट करता रहा है. भारत ने साल 1988 से ही फिलिस्तीन स्टेट का समर्थन किया है. नेतन्याहू की 2018 भारत यात्रा के 3 सप्ताह के बाद ही पीएम मोदी ने रामल्ला वेस्ट बैंक सिटी का दौरा कर फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से मुलाकात की और ‘स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य’ की उम्मीद जताई, जो शांति के वातावरण में रहे. संयुक्त राष्ट्र में भारत ने कई सारे प्रस्तावों पर संतुलित रुख अपनाया हुआ है. गाजा पट्टी विवाद के कुछ मामलों में उसने मतदान से दूरी बनाई, तो कुछ में वेस्ट बैंक की स्थिति बदलने के प्रयासों की आलोचना भी की. यह कूटनीतिक संतुलन भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की व्यापक विदेश नीति को दर्शाती है. भारत ने 1967 से ही पूर्वी यरुशलम सहित फिलस्तीनी इलाके पर कब्जे के साथ ही डेमोग्राफिक बदलाव को बदलने के प्रयासों का भी विरोध किया है. एक तरफ इजरायल के साथ रणनीतिक संबंध निभाते हुए फिलिस्तीनी अधिकार का आधिकारिक तौर पर समर्थन भी जारी रखा. इजरायल संग ‘जय-वीरू’ क्यों बना है अमेरिका? ईरान की तबाही भी मंजूर, 10 पॉइंट में जानिए राज यह यात्रा क्यों अहम है? हमास की तरफ से 7 अक्टूबर 2023 के दिन इजरायल में पैराशूट से घुसकर हुए हमले के बाद पश्चिम एशिया में तनाव काफी बढ़ा है. ऐसे समय में मोदी की इजरायल यात्रा को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह यात्रा ‘दो सशक्त लोकतंत्रों के बीच गहरी और दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी की पुष्टि’ करेगी और साझा चुनौतियों पर विचार का अवसर देगी. अभी हाल ही में भारत ने 100 से अधिक देशों के साथ मिलकर कब्जे वाले पश्चिमी तट में इजरायली विस्तार की निंदा की थी. वहीं 7 अक्टूबर के हमले की भारत ने कड़ी आलोचना की और साथ ही दो-राष्ट्र समाधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को भी दोहराया. एक्सपर्ट्स का मानना है कि मोदी युग में भारत-इजरायल संबंध रक्षा और सुरक्षा से आगे बढ़कर तकनीक, नवाचार और वैश्विक रणनीतिक सहयोग के नए आयामों तक पहुंच चुके हैं लेकिन फिलिस्तीन के मुद्दे पर संतुलन साधना नई दिल्ली के लिए भविष्य में भी एक कूटनीतिक चुनौती ही बना रहेगा.

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