भारत ने तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित परमाणु ऊर्जा संयंत्र में क्रिटिकैलिटी यानी क्रांतिकता हासिल कर ली। अगर भारत का परमाणु कार्यक्रम इसी क्रिटिकैलिटी की सफल राह पर आगे बढ़ा तो परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र
परमाणु ऊर्जा में आत्मनिर्भर होगा भारत: जो अब तक सिर्फ रूस कर सका वो हम करेंगे, कलपक्कम में ऐसा क्या हुआ?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}} परमाणु ऊर्जा में आत्मनिर्भर होगा भारत: जो अब तक सिर्फ रूस कर सका वो हम करेंगे, कलपक्कम में ऐसा क्या हुआ?तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित परमाणु ऊर्जा संयंत्र से सोमवार को एक बड़ी खबर आई। वैज्ञानिकों ने यहां परमाणु ऊर्जा को लेकर जारी एक प्रयोग में क्रिटिकैलिटी हासिल कर ली। इस उपलब्धि को हासिल करने के साथ ही भारत अब परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की तरफ कदम बढ़ा चुका है।भारत ने तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित परमाणु ऊर्जा संयंत्र में क्रिटिकैलिटी यानी क्रांतिकता हासिल कर ली। अगर भारत का परमाणु कार्यक्रम इसी क्रिटिकैलिटी की सफल राह पर आगे बढ़ा तो परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनने में देर नहीं लगेगी। इसका असर यह होगा कि भारत जल्द ही पारंपरिक जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा पैदा करने की जगह स्वच्छ अक्षय ऊर्जा पैदा करने के लिए तैयार हो जाएगा।यह वीडियो/विज्ञापन हटाएं ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत का कलपक्कम परमाणु ऊर्जा संयंत्र क्या है? क्रिटिकैलिटी क्या होती है और इसे हासिल करने के बाद पलक्कम संयंत्र के चर्चा में आने की क्या वजहें हैं? भारत के लिए यह उपलब्धि कितनी बड़ी है? कैसे भारत 1950 के दशक में देखा गया परमाणु ऊर्जा का तीन चरण का सपना पूरा करने के करीब आ गया है?तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत का पहला स्वदेशी फास्ट ब्रीडर परमाणु रिएक्टर है। 500 मेगावाट क्षमता वाले इस उन्नत रिएक्टर को इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र की ओर से डिजाइन और भाविनी की तरफ से निर्मित किया गया है। इसे बनाने में 200 से ज्यादा भारतीय उद्योगों और लघु एवं मध्यम उद्योगों की भूमिका रही है। भारत पिछले करीब 40 साल से एक फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर में प्रयोगों को अंजाम दे रहा है। भारत का परमाणु ऊर्जा विभाग इस दौरान परमाणु ईंधन के सही और पूरी क्षमता के साथ इस्तेमाल की कोशिशों में जुटा है। चूंकि अन्य कोई भी देश अपनी संवेदनशील परमाणु ऊर्जा तकनीक भारत को मुहैया कराने के लिए तैयार नहीं हुआ है। इसलिए आईजीसीएआर ने खुद ही एक परिपूर्ण फास्ट ब्रीडर रिएक्टर को बनाने में ताकत झोंक दी। इसी का नतीजा है कि कलपक्कम में पीएफबीआर भी अब सफलता की ओर है।पारंपरिक ऊर्जा संयंत्रों के उलट, यह फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अपने संचालन के दौरान जितना परमाणु ईंधन जलाता है, उससे कहीं अधिक नया ईंधन पैदा करता है। इसके कोर में यूरेनियम-प्लूटोनियम मिक्स्ड ऑक्साइड ईंधन का उपयोग होता है, जिसके चारों ओर यूरेनियम-238 का एक ब्लैंकेट रखा जाता है। जब एक रसायनिक प्रतिक्रिया पूरी हो जाती है तो इसी दौरान उच्च गति वाले न्यूट्रॉन एक रिएक्शन के बाद बेकार माने जाने वाले यूरेनियम-238 को ताजा प्लूटोनियम में बदल देते हैं। इसका इस्तेमाल एक बार फिर नए ईंधन के रूप में किया जा सकता है। एक तरह से कहें तो यह कभी न खत्म होने वाला ईंधन बन जाता है।दुनियाभर में परमाणु ऊर्जा संयंत्र मौजूदा समय में लाइट वॉटर रिएक्टरों का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें ईंधन के तौर पर यूरेनियम लगता है। हालांकि, दुनिया में यूरेनियम के भंडार लगातार घट रहे हैं और नए भंडार की कम मौजूदगी की वजह से धीरे-धीरे खात्मे की कगार पर पहुंचने वाले हैं। भारत के पास भी यूरेनियम के भंडार काफी कम हैं। रिपोर्ट्स की मानें तो भारत के पास दुनिया का केवल एक प्रतिशत यूरेनियम है। हालांकि, फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों की खास बात यह है कि पारंपरिक रिएक्टर्स से इतर इनमें ईंधन के तौर पर प्लूटोनियम और थोरियम का भी इस्तेमाल हो सकता है। आकलन के मुताबिक, वैश्विक थोरियम भंडार का लगभग 25 फीसदी हिस्सा भारत में, खासकर दक्षिण भारत की तटीय रेत में मौजूद है। यह भारत को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा थोरियम का भंडार बनाता है। थोरियम को जब तेज रफ्तार के न्यूट्रॉन के संपर्क में लाया जाता है तो यह यूरेनियम-233 पैदा करता है। यानी थोरियम सीधे तौर पर एक बेहद कीमती परमाणु तत्व में बदल जाता है। कलपक्कम का यह रिएक्टर इसी काम में माहिर है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगर यह सफल होता है तो भारत अपने थोरियम भंडार से वर्षों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो जाएगा।कलपक्कम में स्थित 500 मेगावाट का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर 6 अप्रैल 2026 को ऐतिहासिक क्रिटिकैलिटी हासिल करने की वजह से चर्चा में आया है। आइये जानते हैं यह क्रिटिकैलिटी क्या होती है और कितनी अहम है.
..क्रिटिकैलिटी किसी परमाणु रिएक्टर के संचालन की वह खास स्थिति है, जिसमें परमाणु विखंडन की शृंखला प्रतिक्रिया स्थिर हो जाती है और यह प्रतिक्रिया लगातार जारी रखने में सक्षम हो जाती है। इसका मतलब है कि यह रिएक्टर अब बिना किसी बाहरी दखल के मौजूदा ईंधन के जरिए ऊर्जा पैदा करने के लिए तैयार हो गया है। हालांकि, यह बताना भी अहम है कि क्रिटिकैलिटी हासिल करना सीधे तौर पर बिजली पैदा करना नहीं है, बल्कि यह उसके लिए सबसे जरूरी और पहली शर्त है। अब इस रिएक्टर की क्षमता और कुशलता को समझने के लिए कम-क्षमता वाले कुछ परीक्षण किए जाएंगे, जिसके बाद इसे पावर ग्रिड से जोड़कर बिजली उत्पादन शुरू किया जा सकता है। भारत में आम लोगों को मिलेंगे एटमी उपकरण?: परमाणु ऊर्जा कानून में बदलाव का प्रस्ताव संसद में मंजूर, जानें मायने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 अप्रैल को इस उपलब्धि की घोषणा करते हुए इसे भारत की असैन्य परमाणु यात्रा में एक निर्णायक कदम बताया। उनके साथ-साथ विदेश मंत्री एस. जयशंकर, देश-विदेश के वैज्ञानिकों ने भी इस उपलब्धि की चर्चा शुरू कर दी। अगर यह संयंत्र सारे प्रयोगों में सफल हो जाता है और इसे बिजली पैदा करने के लिए वाणिज्यिक यानी कमर्शियल ग्रिड से जोड़ दिया जाता है तो भारत दुनिया का सिर्फ दूसरा ऐसा देश बन जाएगा, जिसके पास व्यावसायिक रूप से संचालित होने वाला फास्ट ब्रीडर रिएक्टर होगा। अब तक यह उपलब्धि सिर्फ रूस के पास ही मौजूद है। इतना ही नहीं यह भारत के तीन-चरण के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण की सबसे बड़ी सफलता है। यह उपलब्धि भविष्य में भारत के विशाल थोरियम भंडार का ऊर्जा के लिए इस्तेमाल करने का रास्ता साफ करती है।आने वाली चार शताब्दियों की ऊर्जा सुरक्षा: भारत के पास यूरेनियम का भंडार भले ही दुनिया का एक प्रतिशत हो, लेकिन वैश्विक थोरियम का लगभग 25 प्रतिशत भंडार भारत में मौजूद है। वर्तमान में भारत अपने ऊर्जा स्रोतों के लिए आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है। इस रिएक्टर की सफलता के बाद भारत अपने थोरियम भंडार का उपयोग करके अगले 400 वर्षों तक 500 गीगावाट बिजली उत्पन्न करने में सक्षम हो सकता है। आत्मनिर्भरता और तीसरे चरण का प्रवेश द्वार: यह ऐतिहासिक कदम भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा की तरफ से तैयार किए गए तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तीसरे चरण में प्रवेश करने के लिए एक निर्णायक कदम है। इसके जरिए भारत आखिरकार परमाणु ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बन सकता है और उसे विदेशी परमाणु ईंधन का आयात करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की तकनीक अत्यंत जटिल है। अमेरिका, फ्रांस और जापान जैसे कई विकसित देशों ने तरल सोडियम को सुरक्षित रूप से संभालने में विफलता और अन्य वित्तीय चिंताओं के कारण अपने कार्यक्रमों को बंद कर दिया। इसके व्यावसायिक रूप से ग्रिड से जुड़ने के बाद, रूस के बाद भारत दुनिया का केवल दूसरा देश बन जाएगा जिसके पास वाणिज्यिक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर होगा।चूंकि यह रिएक्टर पहले चरण के रिएक्टरों से निकले इस्तेमाल किए गए ईंधन का दोबारा इस्तेमाल करता है, यह परमाणु कचरे की मात्रा को कई गुना कम कर देता है। इसके अलावा, थोरियम रिएक्टरों से निकलने वाले कचरे में ऐसे आइसोटोप नहीं होते, जिनकी हाफ-लाइफ 35 वर्ष से ज्यादा हो, जिससे कचरे को लंबे समय तक विशाल भूमिगत स्टोरेज में डंप करने की चिंता काफी कम हो जाती है।यूरेनियम की तरह ही थोरियम से बिजली पैदा करने पर कोई ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित नहीं होती है, जिससे यह ऊर्जा का एक बहुत ही स्वच्छ स्रोत बन जाता है। प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, यह भारत को अपने नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों को हासिल करने में भी काफी मदद करेगा।देश को सस्ती और प्रचुर मात्रा में बिजली मिलने से खाना पकाने और परिवहन के लिए आयातित गैस, पेट्रोल और डीजल पर हमारी निर्भरता कम हो सकती है। इसके अलावा, आयात कम होने से पश्चिम एशिया में तनाव जैसी भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण आने वाले तेल और गैस संकट से भी भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक सुरक्षित हो जाएगी।in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and moreहम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी
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