बीजेपी आज ममता बनर्जी की पुरानी स्क्रिप्ट का इस्तेमाल करके उनके साथ वही 'खेला' कर रही है, जो उन्होंने 15 साल पहले लेफ्ट और कांग्रेस के साथ किया. फर्क ये है कि ममता ने अपने विपक्ष को जमींदोज़ करने में कुछ वक्त लिया था, बीजेपी ने वही काम एक महीने में कर दिया है.
बीजेपी आज ममता बनर्जी की पुरानी स्क्रिप्ट का इस्तेमाल करके उनके साथ वही 'खेला' कर रही है, जो उन्होंने 15 साल पहले लेफ्ट और कांग्रेस के साथ किया.
फर्क ये है कि ममता ने अपने विपक्ष को जमींदोज़ करने में कुछ वक्त लिया था, बीजेपी ने वही काम एक महीने में कर दिया है. ममता बनर्जी ने जिन पैंतरों से तृणमूल कांग्रेस को मजबूत बनाया, वही अब उनके लिए मुश्किल बन गए हैं.
आज तृणमूल कांग्रेस टूटने के कगार पर खड़ी है. 2026 के विधानसभा चुनाव नतीजों से यह तो पता चल गया था कि ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के पास पहले जैसा चुनावी बारूद नहीं बचा है. लेकिन, पार्टी का संगठन भीतर से इतना कमजोर हो गया है, यह जरा चौंकाने वाला रहा. ममता बनर्जी जो कभी पार्टी की सुप्रीमो हुआ करती थीं, आज बागियों द्वारा महज एक 'एडवाइजर' बनाकर किनारे कर दी गई हैं.
वे एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस चुकी हैं, जहां से निकलना नामुमकिन लग रहा है. वे न तो अपनी बनाई पार्टी छोड़ सकती हैं और न ही अपने भाइपो अभिषेक बनर्जी को. वो भाइपो जो टीएमसी में समानांतर सत्ता थे, और अब कलह का कारण. के अंदर बगावत की आग सुलग चुकी है.
अभिषेक बनर्जी और पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष रतिंद्र बोस ने स्पीकर को पत्र सौंपकर सोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष, असिमा पात्रा को डिप्टी लीडर और फरहाद हकीम को चीफ व्हिप बनाने की घोषणा की थी. लेकिन बागी गुट ने इस फैसले को ठेंगा दिखा दिया. बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी ने टीएमसी के 80 में से 60 विधायकों के हस्ताक्षर वाला पत्र स्पीकर को सौंपकर खुद को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिया है.
उनके साथ जावेद अहमद खान, शबीना यास्मीन, शीलू साह और संदीपन साह उपनेता बन गए हैं, जबकि अखरुजमा को चीफ व्हिप बना दिया गया है. यानी पूरी की पूरी टीएमसी अब बागियों के कब्जे में है. यह सब कैसे हुआ? इसे समझने के लिए हमें बंगाल की सियासत में अपनाए गए 'साम, दाम, दंड, भेद' को समझना होगा.
बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी में बगावत, क्या करेगी बीजेपी? देखेंममता की कठिन परीक्षा, बागियों को स्वीकार करें या पार्टी में फूट का जोखिम उठाएंराजनीति में 'साम' का मतलब होता है समझाना, फुसलाना या माहौल को अपने पक्ष में करना. जबने 2011 में सत्ता संभाली थी, तब उन्होंने 'परिवर्तन' के नारे के जरिए लेफ्ट के कैडर को यह समझाया था कि अब वामपंथ का दौर खत्म हो चुका है.
उन्होंने लेफ्ट के बड़े-बड़े चेहरों जैसे अब्दुल रज्जाक मोल्ला और पारेश चंद्र अधिकारी को अपनी तरफ मिलाया ताकि जनता को लगे कि पुराना जहाज अब डूब रहा है. आज यही 'साम' नीति उनके खिलाफ इस्तेमाल हो रही है. बीजेपी और बागी गुट ने टीएमसी के विधायकों को यह समझाने में कामयाबी हासिल कर ली कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में अब पार्टी का कोई भविष्य नहीं बचा है.
भाइपोवाद से परेशान विधायकों को यह अहसास कराया गया कि अगर वे अब भी ममता के साथ रहे, तो उनका राजनीतिक करियर खत्म हो जाएगा. दाम: सत्ता का लालच और सिक्योर फ्यूचर 'दाम' यानी कीमत चुकाना या फायदा पहुंचाना.
ममता बनर्जी ने सत्ता में आने के बाद लेफ्ट और कांग्रेस के उन पार्षदों, पंचायत सदस्यों और स्थानीय नेताओं को लालच और सुरक्षा का 'दाम' दिया था, जो अपनी राजनीतिक जमीन बचाना चाहते थे. रातों-रात पूरे के पूरे स्थानीय निकाय टीएमसी के पाले में आ गए थे क्योंकि नेताओं को अपना धंधा और प्रभाव बचाना था. साल 2026 में बीजेपी और बागी गुट ने इसी फॉर्मूले को और बड़े पैमाने पर दोहराया.
चुनाव नतीजों के बाद टीएमसी के 60 विधायकों को यह साफ दिख गया कि सत्ता अब हाथ से जा चुकी है. बागी गुट ने अपने समर्थक विधायकों को नए सत्ता समीकरण में भविष्य की राजनीतिक सुरक्षा का 'दाम' दिया. इसी का नतीजा है कि आज ऋतब्रत बनर्जी के पास 60 विधायकों का खुला समर्थन है, और अभिषेक बनर्जी द्वारा तय किए गए नाम धरे के धरे रह गए.
ममता बनर्जी के राज में 'दंड' की नीति सबसे ज्यादा चर्चा में रही. 2011 के बाद लेफ्ट और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर पुराने मुकदमे लादे गए. वाम दलों के सैकड़ों दफ्तरों को या तो बंद करा दिया गया, या उन पर तृणमूल का झंडा लगा दिया गया. इससे विपक्ष के पास स्थानीय स्तर पर बैठकें करने या रणनीति बनाने की जगह नहीं बची. जिसे 'इलाका दखल' कहा गया.
पुलिस और प्रशासन ने विपक्षी कार्यकर्ताओं की बात सुनना बंद कर दिया. सत्ता बदलने के बाद, वामदल के निचले स्तर के काडर, स्थानीय कमेटियों के सदस्यों और बाहुबलियों के सामने दो ही रास्ते थे- या तो वे निष्क्रिय हो जाएं या अपनी सुरक्षा और प्रभाव बनाए रखने के लिए TMC में शामिल हो जाएं. ज्यादातर ने दूसरा ऑप्शन चुना. कई स्थानीय निकाय और पंचायतों में नेताओं-पदाधिकारियों ने रातोंरात पाला बदल लिया.
लेकिन इस बार 'दंड' की इस नीति की रफ्तार बुलेट ट्रेन जैसी रही. ममता बनर्जी ने जो काम पांच साल में धीरे-धीरे किया था, उसे नई व्यवस्था ने महज एक महीने के भीतर अंजाम दे दिया. इसे इत्तेफाक कहेंगे या कुछ और कि एक तरफ ऋतब्रत बनर्जी बगावत का ऐलान कर रहे थे, तो दूसरी और पुराने मामलों में पूछताछ के लिए ईडी अभिषेक बनर्जी के दरवाजे पर खड़ी थी.
केंद्रीय एजेंसियों की जांच, पुराने घोटालों की फाइलों का दोबारा खुलना और प्रशासनिक तख्तापलट ने टीएमसी के नेताओं के भीतर खौफ पैदा कर दिया है. जो टीएमसी नेता अपनी दबंगई से कट-मनी वसूल कर रहे थे, अब वे लाऊडस्पीकर पर ऐलान करके लोगों का पैसा लौटा रहे हैं. जो नेता कल तक सीना तानकर घूमते थे, वे आज जेल जाने के डर से बागी गुट के पाले में जाकर खड़े हो गए हैं.
चाणक्य नीति में 'भेद' को सबसे अचूक हथियार माना गया है, यानी अपनों के बीच ही फूट डाल देना. ममता बनर्जी ने कांग्रेस के साथ मिलकर 2011 का चुनाव जीता था, लेकिन बाद में उन्होंने 'भेद' नीति के जरिए कांग्रेस के गढ़ों जैसे मालदा और मुर्शिदाबाद में सेंध लगाई. मौसम नूर और मानस भुइयां जैसे कद्दावर कांग्रेस नेताओं को तोड़कर उन्होंने कांग्रेस को बंगाल में लगभग शून्य पर ला दिया था.
आज टीएमसी खुद इसी 'भेद' नीति की सबसे बड़ी शिकार बनी है. पार्टी के भीतर 'पुराने बनाम नए' की लड़ाई काफी समय से चल रही थी. एक तरफ ममता के पुराने वफादार जैसे सोभनदेब चट्टोपाध्याय और फरहाद हकीम थे, तो दूसरी तरफ अभिषेक बनर्जी की नई टीम. बागी गुट और विरोधी ताकतों ने इसी दरार में अपनी कुल्हाड़ी चला दी.
जब अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर को सोभनदेब चट्टोपाध्याय और फरहाद हकीम के नामों की पर्ची सौंपी, तो उन्हें लगा कि वे पार्टी पर अपना नियंत्रण बनाए रखेंगे. लेकिन अंदर ही अंदर 'भेद' का खेल हो चुका था. ऋतब्रत बनर्जी ने 60 विधायकों के दस्तखत वाला पत्र सौंपकर ममता और अभिषेक के पैरों के नीचे से जमीन ही खींच ली.
उन्होंने जावेद अहमद खान और शबीना यास्मीन जैसे चेहरों को अपने साथ जोड़कर यह दिखा दिया कि पार्टी के भीतर अब ममता बनर्जी की कमान पूरी तरह टूट चुकी है. साल 2011 में जब ममता बनर्जी ने 34 साल पुराने लेफ्ट के किले को ढहाया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि ठीक 15 साल बाद यानी 2026 में इतिहास इतनी बेरहमी से खुद को दोहराएगा.
आज बंगाल के राजनीतिक मंच पर जो नाटक चल रहा है, उसकी पटकथा भले ही नई हो, लेकिन उसका तरीका बिल्कुल पुराना है. फर्क सिर्फ इतना है कि ममता बनर्जी को लेफ्ट और कांग्रेस को जमीन में मिलाने में पूरे पांच साल का वक्त लगा था, जबकिने चुनावी नतीजों के बाद यही काम महज एक महीने के भीतर कर दिखाया. तरीका वही है- 'साम, दाम, दंड, भेद'.
ममता ने जिस चक्रव्यूह का इस्तेमाल अपने विरोधियों के लिए किया था, आज वे खुद उसी चक्रव्यूह के बीच खड़ी हैं. वे न तो अपनी पार्टी बचा पा रही हैं और न ही अपने भाइपो को. Govt Firms Stake Sell: क्या संकट बड़ा है?
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तृणमूल कांग्रेस ऋतब्रत बनर्जी शुभेंदु अधिकारी भाजपा
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