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First Hydrogen Train in India: A New Hope for Environmental Protection

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First Hydrogen Train in India: A New Hope for Environmental Protection
Hydrogen TrainNet-Zero Carbon EmissionClean Energy

The first indigenous hydrogen train in India, which will run on clean energy without carbon emissions, is a significant step towards achieving the Indian Railways' net-zero carbon emission target by 2030. The train, which will be powered by hydrogen fuel cells, will showcase the future of sustainable energy and its potential to reduce carbon emissions. However, there are concerns about the high cost and the need for a robust infrastructure.

विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: पर्यावरण संरक्षण की नई उम्मीद दिखाती देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन India's First Hydrogen Train: विश्व पर्यावरण दिवस पर जानिए देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन के बारे में। यह ट्रेन स्वच्छ ऊर्जा के जरिए बिना कार्बन उत्सर्जन के चलेगी और भारतीय रेलवे के 2030 तक नेट-जीरो लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।विश्व पर्यावरण दिवस पर आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन के उपायों पर चर्चा कर रही है, तब भारतीय रेलवे की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन विशेष महत्व हासिल कर रही है। जिंद-सोनीपत रेलखंड पर शुरू होने जा रही यह ट्रेन स्वच्छ ऊर्जा आधारित भविष्य की संभावनाएं दिखाती है। हालांकि इसकी ऊंची लागत और बड़े आधारभूत ढांचे की आवश्यकता को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। रेलवे के 2023 के अनुमान के अनुसार, एक हाइड्रोजन ट्रेन पर लगभग 80 करोड़ रुपए और प्रति रूट आधारभूत ढांचे पर करीब 70 करोड़ रुपए खर्च होंगे। 35 ट्रेनों की हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज योजना पर कुल निवेश 5,000 करोड़ रुपए से अधिक बैठ सकता है।ट्रेन में विशेष टैंकों में संग्रहित हाइड्रोजन गैस फ्यूल सेल तक पहुंचती है, जहां ऑक्सीजन के साथ रासायनिक प्रक्रिया के जरिए बिजली उत्पन्न होती है। यही बिजली मोटरों को चलाती है। इस प्रक्रिया में कार्बन उत्सर्जन नहीं होता और केवल जलवाष्प निकलती है। जिंद-सोनीपत परियोजना के लिए तैयार ट्रेन में दस कोच होंगे। इनमें दो पावर कार और आठ यात्री डिब्बे शामिल हैं। अधिकतम गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा रहेगी।पहाड़ी क्षेत्रों, विरासत रेलमार्गों और कम ट्रैफिक वाले मार्गों पर विद्युतीकरण की लागत अधिक होती है। हाइड्रोजन ट्रेनें ऐसे क्षेत्रों में डीजल इंजनों का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प बन सकती हैं।रेलवे ने 2030 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है। जिंद-सोनीपत परियोजना के नतीजे यह तय करेंगे कि भविष्य में इस तकनीक का विस्तार अन्य रेलखंडों तक किया जाएगा या नहीं। इसकी सफलता ही तय करेगी कि हाइड्रोजन रेलवे के लिए बड़े बदलाव का माध्यम बनती है या फिर चुनिंदा मार्गों तक सीमित रहने वाली तकनीक साबित होती है।रेलवे भविष्य में कालका-शिमला, दार्जिलिंग हिमालयन, नीलगिरि पर्वतीय, माथेरान, कांगड़ा घाटी, बिलिमोरा-वाघई, पातालपानी-कालाकुंड तथा मारवाड़-गोरम घाट जैसे विरासत और पर्वतीय रेलमार्गों पर हाइड्रोजन ट्रेनों की संभावनाएं तलाश रहा है। बता दें कि 1200 हॉर्सपावर क्षमता से लैस यह हाइड्रोजन ट्रेन एक बार में 2,638 यात्रियों को ले जाने में सक्षम होगी। आठ कोच वाली यह ट्रेन 110 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम रफ्तार से दौड़ सकेगी। अपनी लंबाई और क्षमता के कारण इसे दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेनों में गिना जा रहा है। हरित प्रौद्योगिकी पर आधारित यह परियोजना कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के साथ भारतीय रेलवे के शून्य-कार्बन लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: पर्यावरण संरक्षण की नई उम्मीद दिखाती देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेनअन्नामलाई के मन में क्या है, सोशल मीडिया के जरिए आज खुलकर रखेंगे अपने मन की बात निजी निवेश में सुस्ती और विदेशी पूंजी पलायन पर संसदीय समिति चिंतित, तीन सप्ताह में सरकार को सौंपेगी रिपोर्टRajya Sabha Polls: कांग्रेस ने 7 राज्यसभा उम्मीदवारों का किया ऐलान, पवन खेड़ा और मल्लिकार्जुन खरगे को टिकट.

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