Good Parenting: क्या आप जानते हैं कि बच्चों की खुशी का रिमोट कंट्रोल आपके व्यवहार में छिपा है? जानें डॉ. रितिका पुगालिया से कि कैसे एक खुशहाल घर का माहौल और सकारात्मक नजरिया आपके बच्चे के मानसिक विकास के लिए 'परफेक्ट' साबित हो सकता है।
Good Parenting : माता-पिता अक्सर अपने बच्चों की खुशी के लिए महंगे खिलौनों, बेहतरीन स्कूल और सुख-सुविधाओं का अंबार लगा देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बच्चों की सच्ची खुशी का रिमोट कंट्रोल असल में आपके अपने व्यवहार और मानसिक स्थिति में छिपा होता है?
एक शोध के अनुसार, बताता है कि आपकी खुशी का एक बड़ा हिस्सा आपके माता-पिता के जीन से प्रभावित होता है। यानी, अगर आप खुद को खुशमिजाज रखेंगे, तो आपके बच्चे भी स्वाभाविक रूप से एक खुशहाल और सकारात्मक व्यक्तित्व के साथ बड़े होंगे। The Science of Happiness : खुशी का वैज्ञानिक विभाजन शोध यह स्पष्ट करता है कि हमारी खुशी किसी एक चीज पर निर्भर नहीं होती, बल्कि यह तीन मुख्य हिस्सों में बंटी है: आंतरिक दृष्टिकोण: हैप्पीनेस से जुड़ा एक अध्ययन स्पष्ट करता है कि हमारे जीवन में बाहरी कारक हमारी कुल खुशी में केवल 10 फीसदी की ही भूमिका निभाते हैं। बाकी 90 फीसदी खुशी पूरी तरह से इंसान के आंतरिक दृष्टिकोण और उसके व्यक्तिगत प्रयासों पर निर्भर करती है। जेनेटिक कनेक्शन : शोध के अनुसार, खुशी की इस 90 फीसदी निर्भरता में से लगभग 50 फीसदी हिस्सा बच्चों को अपने पेरेंट्स से विरासत के रूप में मिलता है। प्रयासों का महत्व: बाकी की 40 फीसदी खुशी हम अपनी मेहनत, सोच के तरीके और रोजमर्रा के सकारात्मक प्रयासों से हासिल करते हैं। इसलिए, यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा एक खिलखिलाती और खुशहाल जिंदगी जिए, तो सबसे पहले आपको स्वयं को तनावमुक्त और खुश रखना सीखना होगा। खुशहाल जीवन के 3 मूल मंत्र बच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास और लंबी खुशियों के लिए ये तीन बातें बेहद जरूरी हैं। स्वीकार्यता का भाव जीवन में दुख का एक बड़ा कारण यह है कि हम अक्सर उन चीजों के पीछे भागते हैं जो हमें नहीं मिल पातीं। बच्चों को बचपन से ही यह सिखाना आवश्यक है कि वे जीत की तरह हार को भी शालीनता से स्वीकार करना सीखें। सफल होने पर खुशी मनाना तो आसान है, लेकिन विफल होने पर भी दूसरों की सफलता में शामिल होना और उसे 'सेलिब्रेट' करना एक बड़ा गुण है। इससे उनमें ईर्ष्या खत्म होगी और वे अपनी खुशियों के मालिक खुद बनेंगे। नकारात्मकता से दूरी आज के दौर में कम उम्र में ही बच्चों के भीतर ईर्ष्या, गुस्सा और बदले जैसी भावनाएं पनपने लगी हैं। पेरेंट्स का यह कर्तव्य है कि वे बच्चों के मन से इन नकारात्मक विचारों को समय रहते निकालें। नकारात्मक सोच जीवन का सुकून छीन लेती है। बच्चों को समझाएं कि हर इंसान में कुछ खूबियां और कुछ कमियां होती हैं, हमें केवल अच्छी बातों और आदतों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। साझा भाव और करुणा खुशियां हमेशा साझा करने से बढ़ती हैं। 'शेयरिंग इज केयरिंग' का विचार बच्चों को दया, करुणा और उदारता जैसे मानवीय मूल्यों से जोड़ता है। बच्चों को सिखाएं कि वे जरूरतमंदों की सहायता करें और बुजुर्गों का सम्मान करें। दूसरों में कमियां ढूंढने के बजाय उनकी प्रशंसा करना सिखाएं। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि सच्ची खुशी भौतिक चीजों में नहीं, बल्कि हमारी अच्छी आदतों में बसी होती है। डॉ.
रीतिका पुगलिया के साथ पत्रिका के सवाल जवाब घर का खुशनुमा माहौल बच्चे के माइंड पर क्या असर पड़ता है? क्या पेरेंट्स की अपनी खुशी वास्तव में बच्चे की खुशी की चाबी है?
घर का खुशनुमा माहौल बच्चे के मस्तिष्क के लिए एक 'फर्टिलाइजर ' की तरह काम करता है, जो उसके विकास की नींव रखता है। जब घर में शांति और सकारात्मकता होती है, तो बच्चे के शरीर में तनाव पैदा करने वाले हार्मोन्स कम हो जाते हैं, जिससे उसकी सीखने की क्षमता और याददाश्त बेहतर होती है। पेरेंट्स की खुशी ही वास्तव में बच्चे की खुशी की असली चाबी है क्योंकि खुशी की 50 प्रतिशत निर्भरता पेरेंट्स से मिलने वाले जीन्स पर होती है। खुश पेरेंट्स बच्चे को अधिक सकारात्मक ध्यान दे पाते हैं, जिससे उसमें सुरक्षा का भाव पैदा होता है। बच्चा अपने पेरेंट्स के व्यवहार से सीखता है। यदि आप खुश रहते हैं, तो बच्चा भी वही सकारात्मक नजरिया अपनाता है। आज के कॉम्पिटिटिव दौर में बच्चों में गुस्सा और बदले की भावना जल्दी आ जाती है। पेरेंट्स को कब समझना चाहिए कि उनके बच्चे की नकारात्मक सोच एक मेडिकल समस्या बन रही है?
आज के कॉम्पिटिटिव माहौल में बच्चों में चिड़चिड़ापन सामान्य हो सकता है, लेकिन जब नकारात्मकता उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाए, तो सतर्क होना जरूरी है। पेरेंट्स को तब मेडिकल मदद लेनी चाहिए जब: व्यवहार में बदलाव: यदि बच्चा लगातार हफ्तों तक उदास, गुस्सैल रहे या उसकी नींद और भूख प्रभावित हो। सामाजिक दूरी : वह दोस्तों से मिलना या शौक पूरे करना छोड़ दे और खुद को कमरे में बंद कर ले। अत्यधिक ईर्ष्या : दूसरों की सफलता पर वह केवल दुखी ही नहीं, बल्कि हिंसक या बदले की भावना रखने लगे। दैनिक जीवन में बाधा: यदि उसकी नकारात्मक सोच स्कूल की पढ़ाई या रिश्तों को सामान्य रूप से चलने न दे। बच्चों में 'फेलियर' को न झेल पाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। बच्चों को हार स्वीकार करना सिखाना उनके भविष्य की मानसिक शांति के लिए कितना जरूरी है?
बच्चों के लिए हार को स्वीकार करना सीखना उनकी भविष्य की मानसिक शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि जीवन में दुख का सबसे बड़ा कारण मनचाही चीज न मिलने पर ही होता है। यदि बच्चा बचपन से ही ' फेलियर' को सकारात्मक रूप से लेना नहीं सीखता, तो वह भविष्य में गंभीर तनाव और हीन भावना का शिकार हो सकता है। मानसिक मजबूती: बच्चे जीत की तरह हार को भी शालीनता से स्वीकार करना सीखते हैं, जो उन्हें मुश्किल समय में टूटने से बचाता है। सकारात्मक प्रतिस्पर्धा : वे सफल होने पर खुशी महसूस करने के साथ-साथ दूसरों की सफलता का जश्न मनाने का जज्बा भी रखते हैं। खुशी का नियंत्रण : हार को स्वीकार करने वाला बच्चा अपनी खुशियों की चाबी दूसरों के हाथों में देने के बजाय खुद के पास रखना सीख जाता है। पेरेंट्स बच्चों को खुश करने के लिए गैजेट्स या खिलौने देते हैं। क्या ये 'बाहरी सुख-सुविधाएं' केवल कुछ प्रतिशत तक ही सीमित हैं?
बच्चों को लंबे समय तक खुश रखने का असली तरीका क्या है?
गैजेट्स और खिलौने जैसी बाहरी सुख-सुविधाएं बच्चों की खुशी में केवल 10 प्रतिशत की ही भूमिका निभाते हैं। बच्चों को लंबे समय तक खुश रखने का असली तरीका उन्हें आंतरिक रूप से मजबूत बनाना है। बच्चों को सिखाएं कि वे जीत के साथ-साथ हार को भी शालीनता से स्वीकार करें और दूसरों की सफलता का जश्न मनाएं और बच्चों में दया और उदारता जैसे संस्कार विकसित करें, क्योंकि दूसरों की मदद करने से मिलने वाला आत्मिक सुख ही स्थायी खुशी देता है। 1 से 5 साल के छोटे बच्चों की खुशी पूरी तरह से पेरेंट्स के साथ उनके 'अटैचमेंट' और फिजिकल टच पर कैसे निर्भर करती है? 1 से 5 साल के बच्चों के लिए खुशी का आधार माता-पिता से मिलने वाला 'अटैचमेंट' और फिजिकल टच ही होता है। इस उम्र में बच्चा अपनी सुरक्षा और प्रेम के लिए पूरी तरह पेरेंट्स पर निर्भर रहता है। गले लगाना, साथ खेलना और शारीरिक स्पर्श उनके मस्तिष्क में 'ऑक्सीटोसिन ' जैसे हैप्पी हार्मोन्स रिलीज करते हैं, जो उन्हें भावनात्मक रूप से स्थिर बनाते हैं। 5 से 10 साल के बच्चों में 'दोस्तों के साथ संबंध' और 'स्कूल में मिलने वाली सराहना' कितनी महत्वपूर्ण हो जाती है? 5 से 10 साल की उम्र में बच्चों का सामाजिक दायरा घर से बाहर निकलता है, जहां 'दोस्तों के साथ संबंध' और 'स्कूल में सराहना' उनके आत्मविश्वास के लिए अनिवार्य हो जाते हैं। इस अवस्था में बच्चा समूह में अपनी जगह बनाना चाहता है और दूसरों की नज़र में अपनी योग्यता साबित करना चाहता है। दोस्तों के साथ अच्छे संबंध उसे टीम वर्क और सहानुभूति सिखाते हैं, जो उसकी खुशी को बढ़ाते हैं। स्कूल में शिक्षकों या साथियों से मिलने वाली प्रशंसा उसके भीतर 'सफलता' का अहसास कराती है। यदि उसे प्रशंसा नहीं मिलती, तो वह हीन भावना का शिकार हो सकता है। इसलिए उसे 'जीत' और 'हार' दोनों को सहजता से स्वीकार करना सिखाना चाहिए ताकि उसकी खुशियों की चाबी दूसरों के मूड पर निर्भर न रहे। किशोरावस्था में कदम रखते बच्चों के लिए खुशी का मतलब 'आजादी' और 'पीयर ग्रुप' की मंजूरी बन जाता है। इस उम्र में पेरेंट्स उनकी खुशी और अनुशासन के बीच संतुलन कैसे बनाएं?
किशोरावस्था में बच्चों के लिए 'आजादी' और 'दोस्तों की स्वीकृति' ही खुशी के मुख्य केंद्र बन जाते हैं। इस नाजुक दौर में पेरेंट्स को संतुलन बनाने के लिए 'कमांड ' के बजाय 'कनेक्शन' पर ध्यान देना चाहिए। अनुशासन को थोपने के बजाय आपसी संवाद और तर्क के आधार पर नियम तय करें। बच्चों को उनकी निजी जगह दें और छोटे निर्णयों में उनकी स्वायत्तता का सम्मान करें। जब वे खुद को स्वतंत्र और समझा हुआ महसूस करते हैं, तो उनकी नकारात्मकता कम होती है और वे अनुशासन का पालन स्वेच्छा से करते हैं। याद रखे , पेरेंट्स इस उम्र में बच्चों के दोस्त बनकर रहें।
Good Parenting Happiness Goals For Family The Science Of Happiness किशोरावस्था मूल मंत्र
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