भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते में जीएम खाद्य पदार्थों को शामिल करने पर चिंता जताई जा रही है। पूर्व रॉ प्रमुख विक्रम सूद ने जीएम बीजों पर किसानों की निर्भरता और संभावित खतरों के बारे में चेतावनी दी है। जीटीआरआई ने भी कृषि निर्यात पर नकारात्मक प्रभाव की आशंका जताई है, जिससे भारत सरकार सावधानी बरत रही...
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापार समझौता होने की संभावना है। इस समझौते में जीएम खाद्य पदार्थों और बीजों को शामिल करने पर चिंता जताई जा रही है। ट्रेड डील में यह एक बड़ा गतिरोध बनकर उभरा है। पूर्व रॉ प्रमुख विक्रम सूद और थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। यह भारत की संप्रभुता, कृषि भविष्य और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए दीर्घकालिक निहितार्थ रखती है। पूर्व रॉ चीफ विक्रम सूद ने इस बारे में चेतावनी दी है। उनका कहना है कि जीएम खाद्य पदार्थों से उपभोक्ताओं और किसानों को नुकसान हो सकता है। जीटीआरआई ने भी आगाह किया है कि जीएम उत्पादों से भारत के कृषि निर्यात पर बुरा असर पड़ सकता है। भारत सरकार इस मामले पर सावधानी से विचार कर रही है। कारण है कि इससे देश के किसानों और व्यापार पर असर पड़ेगा।20 साल पहले भी दी थी चेतावनीपूर्व रॉ चीफ विक्रम सूद ने कहा है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर बातचीत जारी है। इस बातचीत में जीएम खाद्य पदार्थों और बीजों का मुद्दा भी शामिल है। 20 साल पहले उन्होंने जीएम खाद्य पदार्थों के खतरों के बारे में चेतावनी दी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि किसानों को हर साल नए जीएम बीज खरीदने पड़ेंगे। ये बीज खुद से नहीं उगते हैं। इसका मतलब है कि किसान हमेशा के लिए इन बीजों पर निर्भर रहेंगे। इसके अलावा, इन बीजों से पर्यावरण और लोगों को भी नुकसान होगा।सूद ने एक फ्रांसीसी शोधकर्ता के काम का हवाला देते हुए कहा, 'नाथन बटालियन ने 50 हानिकारक प्रभावों की सूची दी है।' सूद ने आगे कहा, 'अमेरिका के लिए हमेशा अमेरिकी हित पहले होते हैं। इसका मतलब अमेरिकी व्यापारिक हित भी होता है, जो लॉकहीड मार्टिन से लेकर मोनसेंटो, माइक्रोसॉफ्ट, एक्सॉनमोबिल और बाकी सब कुछ तक अलग-अलग होता है। उन्हें नाराज करो और तुम अमेरिका को नाराज करो। कम से कम यह ऐसा ही हुआ करता था।'विक्रम सूद के अनुसार, भारत और अमेरिका क्षेत्रीय खतरों और हितों को अलग-अलग तरह से देखते हैं। भारत को अमेरिकी हितों के आगे झुकने की जरूरत नहीं है। अमेरिका को यह स्वीकार करना होगा कि मतभेद होना स्वाभाविक है। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत अमेरिका विरोधी है।लॉलीपॉप नहीं लेगा भारत सीमित रियायतों या तात्कालिक व्यापारिक फायदों की लॉलीपॉप से अमेरिका इस डील को अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करेगा। इनमें अमेरिकी सेब, पेकन नट्स, बादाम, अखरोट और संभव है कि कच्चे तेल और रक्षा उपकरणों की खरीद शामिल हो। वहीं, जीएम खाद्य पदार्थों और बीजों पर दीर्घकालिक निर्भरता से एक तरह से 'गुलाम' बनने का खतरा रहेगा। विक्रम सूद की चेतावनी को महत्वपूर्ण है। जीएम सीड खुद पैदा नहीं होते हैं। इसका साफ मतलब है कि किसानों को हर साल नए बीज खरीदने पड़ेंगे। यह भारतीय किसानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर स्थायी रूप से निर्भर बना देगा। इससे उनकी स्वायत्तता खत्म हो जाएगी। यह कृषि संप्रभुता के लिए बड़ा खतरा है।जीएम फसलों के पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर संभावित हानिकारक प्रभावों को लेकर लगातार चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं। फ्रांसीसी शोधकर्ता नाथन बटालियन की रिसर्च इस चिंता को बल देती है। भारत जैसे बड़े और जैव विविधता वाले देश में इन प्रभावों का आकलन करना और उनसे निपटना एक बड़ी चुनौती होगी।ट्रंप प्रशासन के तहत 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति सर्वोपरि रही है। लॉकहीड मार्टिन से लेकर मोनसेंटो और माइक्रोसॉफ्ट तक, अमेरिकी कंपनियां भारत में अपने उत्पादों और सेवाओं के लिए बाजार चाहती हैं। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी व्यापार समझौते में उसके अपने राष्ट्रीय हित, विशेषकर करोड़ों किसानों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा से समझौता न हो। कृषि और डेयरी क्षेत्र मौजूदा व्यापार वार्ताओं में प्रमुख गतिरोध के बिंदु बने हुए हैं। भारत इन संवेदनशील क्षेत्रों को खोलने का इच्छुक नहीं है, जो कि बिल्कुल सही रुख है। इन क्षेत्रों को खोलने से लाखों भारतीय किसानों की आजीविका पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।भारत को क्या करना चाहिए?भारत को GM खाद्य पदार्थों और बीजों के मुद्दे पर अपनी दृढ़ता बनाए रखनी चाहिए। तात्कालिक व्यापारिक लाभों के लिए दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं किया जा सकता। भारतीय कृषि और किसानों की आजीविका को किसी भी कीमत पर संरक्षित किया जाना चाहिए। GM फसलों के संभावित पर्यावरणीय और स्वास्थ्य प्रभावों का व्यापक मूल्यांकन किया जाना चाहिए और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। भारत को अपने कृषि निर्यात बाजारों, विशेष रूप से यूरोपीय संघ जैसे संवेदनशील बाजारों में अपनी 'GMO-मुक्त' छवि को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। भारत को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्षेत्रीय खतरे और हित अमेरिका से भिन्न हो सकते हैं और इन मतभेदों को 'अमेरिका-विरोधी' के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।.
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच एक व्यापार समझौता होने की संभावना है। इस समझौते में जीएम खाद्य पदार्थों और बीजों को शामिल करने पर चिंता जताई जा रही है। ट्रेड डील में यह एक बड़ा गतिरोध बनकर उभरा है। पूर्व रॉ प्रमुख विक्रम सूद और थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। यह भारत की संप्रभुता, कृषि भविष्य और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए दीर्घकालिक निहितार्थ रखती है। पूर्व रॉ चीफ विक्रम सूद ने इस बारे में चेतावनी दी है। उनका कहना है कि जीएम खाद्य पदार्थों से उपभोक्ताओं और किसानों को नुकसान हो सकता है। जीटीआरआई ने भी आगाह किया है कि जीएम उत्पादों से भारत के कृषि निर्यात पर बुरा असर पड़ सकता है। भारत सरकार इस मामले पर सावधानी से विचार कर रही है। कारण है कि इससे देश के किसानों और व्यापार पर असर पड़ेगा।20 साल पहले भी दी थी चेतावनीपूर्व रॉ चीफ विक्रम सूद ने कहा है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर बातचीत जारी है। इस बातचीत में जीएम खाद्य पदार्थों और बीजों का मुद्दा भी शामिल है। 20 साल पहले उन्होंने जीएम खाद्य पदार्थों के खतरों के बारे में चेतावनी दी थी। उन्होंने यह भी कहा था कि किसानों को हर साल नए जीएम बीज खरीदने पड़ेंगे। ये बीज खुद से नहीं उगते हैं। इसका मतलब है कि किसान हमेशा के लिए इन बीजों पर निर्भर रहेंगे। इसके अलावा, इन बीजों से पर्यावरण और लोगों को भी नुकसान होगा।सूद ने एक फ्रांसीसी शोधकर्ता के काम का हवाला देते हुए कहा, 'नाथन बटालियन ने 50 हानिकारक प्रभावों की सूची दी है।' सूद ने आगे कहा, 'अमेरिका के लिए हमेशा अमेरिकी हित पहले होते हैं। इसका मतलब अमेरिकी व्यापारिक हित भी होता है, जो लॉकहीड मार्टिन से लेकर मोनसेंटो, माइक्रोसॉफ्ट, एक्सॉनमोबिल और बाकी सब कुछ तक अलग-अलग होता है। उन्हें नाराज करो और तुम अमेरिका को नाराज करो। कम से कम यह ऐसा ही हुआ करता था।'विक्रम सूद के अनुसार, भारत और अमेरिका क्षेत्रीय खतरों और हितों को अलग-अलग तरह से देखते हैं। भारत को अमेरिकी हितों के आगे झुकने की जरूरत नहीं है। अमेरिका को यह स्वीकार करना होगा कि मतभेद होना स्वाभाविक है। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत अमेरिका विरोधी है।लॉलीपॉप नहीं लेगा भारत सीमित रियायतों या तात्कालिक व्यापारिक फायदों की लॉलीपॉप से अमेरिका इस डील को अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करेगा। इनमें अमेरिकी सेब, पेकन नट्स, बादाम, अखरोट और संभव है कि कच्चे तेल और रक्षा उपकरणों की खरीद शामिल हो। वहीं, जीएम खाद्य पदार्थों और बीजों पर दीर्घकालिक निर्भरता से एक तरह से 'गुलाम' बनने का खतरा रहेगा। विक्रम सूद की चेतावनी को महत्वपूर्ण है। जीएम सीड खुद पैदा नहीं होते हैं। इसका साफ मतलब है कि किसानों को हर साल नए बीज खरीदने पड़ेंगे। यह भारतीय किसानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर स्थायी रूप से निर्भर बना देगा। इससे उनकी स्वायत्तता खत्म हो जाएगी। यह कृषि संप्रभुता के लिए बड़ा खतरा है।जीएम फसलों के पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर संभावित हानिकारक प्रभावों को लेकर लगातार चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं। फ्रांसीसी शोधकर्ता नाथन बटालियन की रिसर्च इस चिंता को बल देती है। भारत जैसे बड़े और जैव विविधता वाले देश में इन प्रभावों का आकलन करना और उनसे निपटना एक बड़ी चुनौती होगी।ट्रंप प्रशासन के तहत 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति सर्वोपरि रही है। लॉकहीड मार्टिन से लेकर मोनसेंटो और माइक्रोसॉफ्ट तक, अमेरिकी कंपनियां भारत में अपने उत्पादों और सेवाओं के लिए बाजार चाहती हैं। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी व्यापार समझौते में उसके अपने राष्ट्रीय हित, विशेषकर करोड़ों किसानों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा से समझौता न हो। कृषि और डेयरी क्षेत्र मौजूदा व्यापार वार्ताओं में प्रमुख गतिरोध के बिंदु बने हुए हैं। भारत इन संवेदनशील क्षेत्रों को खोलने का इच्छुक नहीं है, जो कि बिल्कुल सही रुख है। इन क्षेत्रों को खोलने से लाखों भारतीय किसानों की आजीविका पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।भारत को क्या करना चाहिए?भारत को GM खाद्य पदार्थों और बीजों के मुद्दे पर अपनी दृढ़ता बनाए रखनी चाहिए। तात्कालिक व्यापारिक लाभों के लिए दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं किया जा सकता। भारतीय कृषि और किसानों की आजीविका को किसी भी कीमत पर संरक्षित किया जाना चाहिए। GM फसलों के संभावित पर्यावरणीय और स्वास्थ्य प्रभावों का व्यापक मूल्यांकन किया जाना चाहिए और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। भारत को अपने कृषि निर्यात बाजारों, विशेष रूप से यूरोपीय संघ जैसे संवेदनशील बाजारों में अपनी 'GMO-मुक्त' छवि को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। भारत को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्षेत्रीय खतरे और हित अमेरिका से भिन्न हो सकते हैं और इन मतभेदों को 'अमेरिका-विरोधी' के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
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