Ajab Gajab: सीकर जिले का सिंगोदड़ा गांव अपनी अनोखी पहचान और दो जुड़े कुओं के लिए जाना जाता है. सदियों पुराने इतिहास, माताजी के आशीर्वाद और प्राकृतिक आपदाओं से अछूता रहना इस गांव को खास बनाता है. हर साल यहां की परंपराओं और उत्सवों में गांव की संस्कृति की झलक देखने को मिलती है.
सीकर जिले का सिंगोदड़ा गांव पूरे राजस्थान में अपने अनोखे इतिहास और दो अनोखे कुओं के कारण विशेष पहचान रखता है. यह गांव दो ऐसे कुओं के लिए प्रसिद्ध है, जिनका पैंदा नीचे जाकर आपस में जुड़ा हुआ बताया जाता है.
खास बात यह है कि इन दोनों कुओं को एक साथ नहीं बनाया गया था. यह अनोखी संरचना आज भी लोगों के लिए रोचक विषय बनी हुई है. दूर-दूर से लोग इन कुओं को देखने के लिए आते हैं. स्थानीय प्रशासक और सरपंच महेश ढेवा के अनुसार, गांव की स्थापना के समय चूड़ीवाला महाजनों ने यहां पहला कुआं खुदवाया था, लेकिन समय के साथ उसका पानी समाप्त हो गया. इसके बाद गांव को पानी की समस्या का सामना करना पड़ा. पुराने कुएं के सूख जाने से ग्रामीणों में चिंता बढ़ गई, क्योंकि उस समय खेती और पीने के पानी का मुख्य साधन यही कुआं हुआ करता था. इसके बाद, वर्ष 1960 में जब पुराने कुएं को दोबारा खुदवाने की कोशिश की गई, तब भगत जी ने उत्तर दिशा में महज सात हाथ की दूरी पर नया कुआं खोदने की सलाह दी. उन्होंने दावा किया था कि यहां अथाह जल स्रोत मौजूद है. जब यह नया कुआं खोदा गया, तो वास्तव में इसमें पानी निकला, जो आज तक लगातार भरा हुआ है. गांव के बुजुर्गों का मानना है कि जब दूसरा कुआं खोदा जा रहा था, तब नीचे जाकर दोनों कुओं की नाळ यानी पैंदा आपस में मिल गई. यही कारण है कि दोनों कुओं को एक ही पैंदे वाला कुआं कहा जाता है. यह बात पीढ़ियों से चली आ रही है और गांव के इतिहास का हिस्सा मानी जाती है. ग्रामीण बीरबल महरिया बताते हैं कि सिंगोदड़ा गांव पर हमेशा देवी-देवताओं की विशेष कृपा रही है. यहां आज तक न तो अकाल पड़ा और न ही किसी बड़ी महामारी का असर हुआ. संवत 1956 के भीषण अकाल के दौरान भी गांव में फसल हुई और एक भी जान नहीं गई. यहां तक कि प्लेग बीमारी का भी गांव पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. मान्यता है कि गांव पर माताजी का वरदान है. इसी विश्वास के चलते हर साल जेठ और आषाढ़ माह में सर्व समाज की ओर से गांव की पूरी सीमा पर ढोल-तासों के साथ दूध की तार बांध दी जाती है. ग्रामीणों का मानना है कि इस परंपरा से गांव को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा मिलती है और सुख-समृद्धि बनी रहती है. सिंगोदड़ा गांव का इतिहास भी काफी रोचक है. संवत 1812 में इसे साले-बहनोई ने मिलकर बसाया था. कूदन के दूदाराम महरिया और उनके जीजा नवलगढ़ के गिरधरपुरा निवासी ढेवा गोत्र के जाट यहां से गुजर रहे थे, तभी उन्होंने रोही में शेर को खदेड़ा. इसी घटना से गांव का नाम सिंगोदड़ा पड़ा, जिसका अर्थ शेर की गुफा है. 1959 में यह ग्राम पंचायत बनी और 1960 में मूंगाराम महरिया पहले सरपंच बने थे.
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