73 साल की रोहिणी रामरूप हर साल मॉरीशस से भारत पहुंच जाती हैं। उनका शरीर भले ही मॉरीशस में रहता है, लेकिन मन अपने देश में बसता है।
जब कभी आप मॉरीशस घूमने जाएं तो वहां बसे भारतीयों से जरूर मिलें। परदेस में बसे भारतीयों की आंखों में आपको अपने देश, अपनी मिट्टी के प्रति अथाह प्यार नजर आएगा। आज मॉरीशस एक खूबसूरत देश बन चुका है। लेकिन इसे बनाने में भारतीयों की लगभग 5-6 पीढ़ियों का योगदान भी है। ‘एनआरआई कनेक्ट’ सीरीज में आज हम आपको मॉरीशस में बसे भारतीयों का इतिहास, त्याग और बलिदान के बारे में बता रहे हैं। मॉरीशस में बसे भारतीयों का इतिहास जानने के लिए हमने शिक्षाविद और समाज सेविका रोहिणी रामरूप से बात की। रोहिणी ने मॉरीशस में बसे भारतीयों का जो इतिहास बताया उसके बारे में जानकर आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे।गिरमिटिया मजदूर बनाकर ले गए मॉरीशस मेरा नाम मिसेज रोहिणी रामरूप है। अपने बारे में बताने से पहले मैं आपको मॉरीशस में बसे हमारे बुजुर्गों के दर्द भरे इतिहास के बारे में बताना चाहती हूं। उन्होंने यहां परदेस में भी अंग्रेजों का जुल्म सहा। उनके त्याग और बलिदान का फल आज हमें मिल रहा है। आज मॉरीशस जो भी है उसे बनाने में हमारे बुजुर्गों का त्याग और बलिदान भी शामिल है। अंग्रेजों ने हमारे पूर्वजों को लालच दिया कि मॉरीशस की मिट्टी में सोना है। गरीबी से जूझ रहे हमारे पूर्वज अपनी जिंदगी सुधारने के लिए मॉरीशस चले गए। उन्हें यहां से एग्रीमेंट साइन करा कर ले जाया गया। हमारे पुरखे अंग्रेजी नहीं जानते थे। वो खुद को ‘गिरमिटिया मजदूर’ कहते यानी ऐसे मजदूर जिन्हें एग्रीमेंट साइन कर के मॉरीशस ले जाया जाता है।हमारे पूर्वजों को पानी के रास्ते मॉरीशस ले जाया गया। कई लोग जब शिप में ही मर जाते तो उन्हें पानी में फेंक दिया जाता था। जो मजदूर बच गए वो मॉरीशस में बस गए। अंग्रेज हमारे पुरखों से दिनभर खेतों में काम करवाते। बाद में जो अंग्रेजों से मिल गए उनकी स्थिति ठीक हो गई। उन्हें रहने के लिए घर मिल गए। वो लोग शहरों में रहने लगे। बाकी सब गांव में रह गए। भारतीयों के खून से सना है मॉरीशस का इतिहास जब हम छोटे थे तो मां कहती थीं कि हम भारतीय हैं। तब से मैं जानना चाहती थी कि हमारे बुजुर्ग भारत में कहां रहते थे। मां हर शाम हमें राष्ट्रगान गाने को कहती। ‘स्वराज दिवस’ यानी 15 अगस्त को मां घर को लीप पोतकर सजाती, मिठाई बनती। ‘तिरंगा झंडा प्राण से प्यारा…’ हम ये गीत गाते थे। उम्र बढ़ने के साथ साथ मेरी जिज्ञासा बढ़ती गई। मुझे भारत और हमारे पुरखों से जुड़े जो भी सुराग मिलते मैं उन्हें संभाल कर रखती। अपने गरीब बुजुर्गों से जुड़ी जानकारी मुझे 'महात्मा गांधी संस्थान मॉरीशस' के आर्काइव से मिली। 20 जुलाई 1853 को पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले से मेरे परदादा पबन 9 साल की उम्र में अपने पिता मोधो के साथ Aneas शिप नंबर 525 से मॉरीशस आए। मेरी परदादी बामा 20 साल की उम्र में हुगली से 16 जनवरी 1873 को Nimrod शिप नंबर 1223 से मॉरीशस आईं। परदादा और परदादी की शादी 15 मई 1876 को मॉरीशस में हुई। मेरे दादा का नाम रामेश्वर रखा गया। उनकी शादी मॉरीशस में झुमकी से हुई। दोनों की संतान नागेश्वर यानी मेरे पिता। मॉरीशस में हमारे बुजुर्गों का जीवन बड़ी गरीबी में बीता। जब मेरा जन्म हुआ तो हमारा घर मिट्टी का था। गन्ने के पत्तों से ढंका मिट्टी से लीपा हुआ घर। पिता गुजरे तो जिंदगी मुश्किल हो गई मैं ढाई साल की थी जब पापा गुजर गए। ब्रोंकाइटिस के कारण उनकी चेस्ट जकड़ गई थी। पापा दिन में घर बनाने का काम करते थे और रात में रोटी बनाने जाते थे। पापा के जाने के बाद मां के कंधों पर हम पांच भाई-बहनों की जिम्मेदारी आ गई। सबसे बड़ा भाई 11 साल का था और सबसे छोटी बहन 11 महीने की। नानाजी से जितना हो सका उन्होंने मां की मदद की। मेरा भाई 11 साल की उम्र से खेत में काम करने लगा। मां बाकुआ पत्ते से टोकरी बनाती और उन्हें बेचती। ये टोकरी तब बाजार के सामान खरीदने के काम आती थी। हम एक वक्त का चावल ही खरीद पाते थे इसलिए एक वक्त का खाना खाते और एक वक्त भूखे रहते। कभी कभार पड़ोसी हमें खाना दे देते थे। फीस के बदले दूध देते थे स्कूल में सब टिफिन लाते, लेकिन हमारे पास टिफिन नहीं होता था। हम सब भाई-बहन पढ़ाई में अच्छे थे। घर की स्थिति ठीक नहीं थी इसलिए बड़ा भाई और बड़ी बहन ज्यादा पढ़ नहीं पाए। फिर मां ने गाय पाली। हम उसका दूध पीते नहीं, बेचते थे। हम मुर्गी के अंडे भी बेचते थे। हमारे पास कॉलेज की फीस भरने के लिए पैसे नहीं होते थे। बड़े भैया फीस के बदले स्कूल मैनेजर को दूध दिया करते। उसे ही हमारी फीस माना जाता। हमारे घर की स्थिति तब सुधरने लगी जब बड़े भैया उसी कॉलेज में पढ़ाने लगे जहां से वो खुद और हम सब पढ़े। हमारी पीढ़ी से मॉरीशस में भारतीयों की स्थिति ठीक होने लगी। धीरे धीरे हम सब भाई बहन अपने पैरों पर खड़े होने लगे। मुझे भी बचपन में बहुत संघर्ष करना पड़ा। मैंने 1972 में 18 साल की उम्र में टीचर ट्रेनिंग का कोर्स किया और टीचर बन गई। मैं शिक्षा मंत्रालय में हिंदी अध्यापिका बनी। इससे पहले मैंने क्लर्क का काम किया। मैंने वर्ष 2006 तक मॉरीशस में हिंदी पढ़ाई। 2015 में मैं रिटायर हुई। मॉरीशस में हिंदी को सुरक्षित रखा इस समय यानी 73 वर्ष की उम्र में मैं ‘हिंदी प्रचारिणी सभा’ की अध्यक्ष हूं। यह सभा हमारे पूर्वजों ने स्थापित की थी। मॉरीशस में 'हिंदी प्रचारिणी सभा' की स्थापना 8 नवंबर 1923 को हुई। पहले इसका नाम ‘हिंदू संगठन सभा’ था। 12 जून 1926 को इस संस्था का नाम ‘तिलक विद्यालय’ रखा गया। जब 27 दिसंबर 1935 को इस संस्था का रजिस्ट्रेशन हुआ तो इसका नाम ‘हिंदी प्रचारिणी सभा’ रखा गया। इस संस्था का उद्देश्य हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार करने के साथ ही इसे सुरक्षित रखना है। मॉरीशस में लगभग 300 स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जाती है ताकि भाषा को सुरक्षित रखा जा सके। हमारा ये मानना है कि भाषा रहेगी तभी हमारी संस्कृति भी सुरक्षित रहेगी। इसके लिए हमें सरकार का सहयोग मिलता है। मैं हर साल भारत पहुंच जाती हूं मैं जब पहली बार अपना परिवार खोजने भारत आई, तो मुझे अपने परिवार का कोई नहीं मिला। हमारे साथ आए कुछ लोगों को उनका परिवार मिला, लेकिन मुझे नहीं मिला। मेरा ये मानना है कि हम भले कहीं भी रहें, हम सबके लिए परिवार का साथ जरूरी है। इतने वर्षों में भारत में सबकुछ बदल चुका था। हमारा गांव जो पहले गुना था, अब परगना हो गया है। हमारा शरीर भले ही मॉरीशस में है, लेकिन मन अब भी अपने देश में है। मैं 73 साल की हो गई हूं। इसके बावजूद मैं अपनी मिट्टी का दर्शन करने हर साल भारत आती हूं। मेरे पास ओसीआई कार्ड है। इसके कारण मैं बिना वीजा के भारत आ सकती हूं। एयरपोर्ट से उतरते ही मैं अपने देश की मिट्टी को प्रणाम करती हूं।.
जब कभी आप मॉरीशस घूमने जाएं तो वहां बसे भारतीयों से जरूर मिलें। परदेस में बसे भारतीयों की आंखों में आपको अपने देश, अपनी मिट्टी के प्रति अथाह प्यार नजर आएगा। आज मॉरीशस एक खूबसूरत देश बन चुका है। लेकिन इसे बनाने में भारतीयों की लगभग 5-6 पीढ़ियों का योगदान भी है। ‘एनआरआई कनेक्ट’ सीरीज में आज हम आपको मॉरीशस में बसे भारतीयों का इतिहास, त्याग और बलिदान के बारे में बता रहे हैं। मॉरीशस में बसे भारतीयों का इतिहास जानने के लिए हमने शिक्षाविद और समाज सेविका रोहिणी रामरूप से बात की। रोहिणी ने मॉरीशस में बसे भारतीयों का जो इतिहास बताया उसके बारे में जानकर आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे।गिरमिटिया मजदूर बनाकर ले गए मॉरीशस मेरा नाम मिसेज रोहिणी रामरूप है। अपने बारे में बताने से पहले मैं आपको मॉरीशस में बसे हमारे बुजुर्गों के दर्द भरे इतिहास के बारे में बताना चाहती हूं। उन्होंने यहां परदेस में भी अंग्रेजों का जुल्म सहा। उनके त्याग और बलिदान का फल आज हमें मिल रहा है। आज मॉरीशस जो भी है उसे बनाने में हमारे बुजुर्गों का त्याग और बलिदान भी शामिल है। अंग्रेजों ने हमारे पूर्वजों को लालच दिया कि मॉरीशस की मिट्टी में सोना है। गरीबी से जूझ रहे हमारे पूर्वज अपनी जिंदगी सुधारने के लिए मॉरीशस चले गए। उन्हें यहां से एग्रीमेंट साइन करा कर ले जाया गया। हमारे पुरखे अंग्रेजी नहीं जानते थे। वो खुद को ‘गिरमिटिया मजदूर’ कहते यानी ऐसे मजदूर जिन्हें एग्रीमेंट साइन कर के मॉरीशस ले जाया जाता है।हमारे पूर्वजों को पानी के रास्ते मॉरीशस ले जाया गया। कई लोग जब शिप में ही मर जाते तो उन्हें पानी में फेंक दिया जाता था। जो मजदूर बच गए वो मॉरीशस में बस गए। अंग्रेज हमारे पुरखों से दिनभर खेतों में काम करवाते। बाद में जो अंग्रेजों से मिल गए उनकी स्थिति ठीक हो गई। उन्हें रहने के लिए घर मिल गए। वो लोग शहरों में रहने लगे। बाकी सब गांव में रह गए। भारतीयों के खून से सना है मॉरीशस का इतिहास जब हम छोटे थे तो मां कहती थीं कि हम भारतीय हैं। तब से मैं जानना चाहती थी कि हमारे बुजुर्ग भारत में कहां रहते थे। मां हर शाम हमें राष्ट्रगान गाने को कहती। ‘स्वराज दिवस’ यानी 15 अगस्त को मां घर को लीप पोतकर सजाती, मिठाई बनती। ‘तिरंगा झंडा प्राण से प्यारा…’ हम ये गीत गाते थे। उम्र बढ़ने के साथ साथ मेरी जिज्ञासा बढ़ती गई। मुझे भारत और हमारे पुरखों से जुड़े जो भी सुराग मिलते मैं उन्हें संभाल कर रखती। अपने गरीब बुजुर्गों से जुड़ी जानकारी मुझे 'महात्मा गांधी संस्थान मॉरीशस' के आर्काइव से मिली। 20 जुलाई 1853 को पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले से मेरे परदादा पबन 9 साल की उम्र में अपने पिता मोधो के साथ Aneas शिप नंबर 525 से मॉरीशस आए। मेरी परदादी बामा 20 साल की उम्र में हुगली से 16 जनवरी 1873 को Nimrod शिप नंबर 1223 से मॉरीशस आईं। परदादा और परदादी की शादी 15 मई 1876 को मॉरीशस में हुई। मेरे दादा का नाम रामेश्वर रखा गया। उनकी शादी मॉरीशस में झुमकी से हुई। दोनों की संतान नागेश्वर यानी मेरे पिता। मॉरीशस में हमारे बुजुर्गों का जीवन बड़ी गरीबी में बीता। जब मेरा जन्म हुआ तो हमारा घर मिट्टी का था। गन्ने के पत्तों से ढंका मिट्टी से लीपा हुआ घर। पिता गुजरे तो जिंदगी मुश्किल हो गई मैं ढाई साल की थी जब पापा गुजर गए। ब्रोंकाइटिस के कारण उनकी चेस्ट जकड़ गई थी। पापा दिन में घर बनाने का काम करते थे और रात में रोटी बनाने जाते थे। पापा के जाने के बाद मां के कंधों पर हम पांच भाई-बहनों की जिम्मेदारी आ गई। सबसे बड़ा भाई 11 साल का था और सबसे छोटी बहन 11 महीने की। नानाजी से जितना हो सका उन्होंने मां की मदद की। मेरा भाई 11 साल की उम्र से खेत में काम करने लगा। मां बाकुआ पत्ते से टोकरी बनाती और उन्हें बेचती। ये टोकरी तब बाजार के सामान खरीदने के काम आती थी। हम एक वक्त का चावल ही खरीद पाते थे इसलिए एक वक्त का खाना खाते और एक वक्त भूखे रहते। कभी कभार पड़ोसी हमें खाना दे देते थे। फीस के बदले दूध देते थे स्कूल में सब टिफिन लाते, लेकिन हमारे पास टिफिन नहीं होता था। हम सब भाई-बहन पढ़ाई में अच्छे थे। घर की स्थिति ठीक नहीं थी इसलिए बड़ा भाई और बड़ी बहन ज्यादा पढ़ नहीं पाए। फिर मां ने गाय पाली। हम उसका दूध पीते नहीं, बेचते थे। हम मुर्गी के अंडे भी बेचते थे। हमारे पास कॉलेज की फीस भरने के लिए पैसे नहीं होते थे। बड़े भैया फीस के बदले स्कूल मैनेजर को दूध दिया करते। उसे ही हमारी फीस माना जाता। हमारे घर की स्थिति तब सुधरने लगी जब बड़े भैया उसी कॉलेज में पढ़ाने लगे जहां से वो खुद और हम सब पढ़े। हमारी पीढ़ी से मॉरीशस में भारतीयों की स्थिति ठीक होने लगी। धीरे धीरे हम सब भाई बहन अपने पैरों पर खड़े होने लगे। मुझे भी बचपन में बहुत संघर्ष करना पड़ा। मैंने 1972 में 18 साल की उम्र में टीचर ट्रेनिंग का कोर्स किया और टीचर बन गई। मैं शिक्षा मंत्रालय में हिंदी अध्यापिका बनी। इससे पहले मैंने क्लर्क का काम किया। मैंने वर्ष 2006 तक मॉरीशस में हिंदी पढ़ाई। 2015 में मैं रिटायर हुई। मॉरीशस में हिंदी को सुरक्षित रखा इस समय यानी 73 वर्ष की उम्र में मैं ‘हिंदी प्रचारिणी सभा’ की अध्यक्ष हूं। यह सभा हमारे पूर्वजों ने स्थापित की थी। मॉरीशस में 'हिंदी प्रचारिणी सभा' की स्थापना 8 नवंबर 1923 को हुई। पहले इसका नाम ‘हिंदू संगठन सभा’ था। 12 जून 1926 को इस संस्था का नाम ‘तिलक विद्यालय’ रखा गया। जब 27 दिसंबर 1935 को इस संस्था का रजिस्ट्रेशन हुआ तो इसका नाम ‘हिंदी प्रचारिणी सभा’ रखा गया। इस संस्था का उद्देश्य हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार करने के साथ ही इसे सुरक्षित रखना है। मॉरीशस में लगभग 300 स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जाती है ताकि भाषा को सुरक्षित रखा जा सके। हमारा ये मानना है कि भाषा रहेगी तभी हमारी संस्कृति भी सुरक्षित रहेगी। इसके लिए हमें सरकार का सहयोग मिलता है। मैं हर साल भारत पहुंच जाती हूं मैं जब पहली बार अपना परिवार खोजने भारत आई, तो मुझे अपने परिवार का कोई नहीं मिला। हमारे साथ आए कुछ लोगों को उनका परिवार मिला, लेकिन मुझे नहीं मिला। मेरा ये मानना है कि हम भले कहीं भी रहें, हम सबके लिए परिवार का साथ जरूरी है। इतने वर्षों में भारत में सबकुछ बदल चुका था। हमारा गांव जो पहले गुना था, अब परगना हो गया है। हमारा शरीर भले ही मॉरीशस में है, लेकिन मन अब भी अपने देश में है। मैं 73 साल की हो गई हूं। इसके बावजूद मैं अपनी मिट्टी का दर्शन करने हर साल भारत आती हूं। मेरे पास ओसीआई कार्ड है। इसके कारण मैं बिना वीजा के भारत आ सकती हूं। एयरपोर्ट से उतरते ही मैं अपने देश की मिट्टी को प्रणाम करती हूं।
मॉरीशस में भारतीय क्यों बसे मॉरीशस में हिंदी प्रचारिणी सभा मॉरीशस में बसी एनआरआई रोहिणी रामरूप रोहिणी रामरूप का देशप्रेम परदेस में बसे भारतीयों का दर्द Indian Professionals In Mauritius Indian Nri In Mauritius Mauritius Me Kitne Indian Hai Mauritius Me Indian Ki Life
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