शाहजहांपुर में एक नवजात बच्ची को जन्म देने वालों ने जिंदा दफन कर दिया। ग्रामीणों ने बहगुल नदी किनारे खेतों में बच्चे के रोने की आवाज सुनी और मिट्टी में दबे हाथ को देखकर पुलिस को बुलाया। गड्ढा खोदकर बच्ची को बाहर निकाला गया जिसके माथे पर तिलक लगा था और नए कपड़े पहने हुए...
जागरण संवाददाता, शाहजहांपुर। उफ.! देखना-पढ़ना तो छोड़िए। सोचने भर से कलेजा दहल जाएगा। किलकारियां भरने वाली नवजात बिटिया के माथे पर तिलक लगाया। नए कपड़े पहनाए.। इसके बाद जिंदा दफन कर दिया। जन्म देने वालों ने ही उसकी मौत का रास्ता तय कर दिया परंतु ईश्वर को यह क्रूर निर्णय स्वीकार नहीं था। उस नवजात बच्ची का एक हाथ किसी तरह गड्ढे के बाहर रह गया। उसमें हलचल देख ग्रामीणों ने पुलिस बुलाकर मिट्टी हटाई और अंदर से रोती निकली बच्ची को गले से लगा लिया। वह गड्ढे में दबी थी मगर, नाक व मुंह में मिट्टी नहीं भरी, शायद उसे दफन करने वालों के हाथ तो कांपे होंगे। ग्रामीण बताते हैं कि रविवार दोपहर एक बजे बहगुल नदी किनारे खेतों पर जाते समय किसी बच्चे के रोने की दबी आवाज आ रही थी। कौतूहलवश चारों ओर देखा मग, कोई नहीं दिखा। अचानक खेत किनारे गीली मिट्टी पर निगाह जाते ही एक हाथ दिखा। इसमें हलचल थी। उसके पास पहुंचने से स्पष्ट हो गया कि नवजात को कोई गड्ढे में दबा गया है। उसकी हथेली पर खून था। शायद पशु-पक्षी उसका मांस नोचना शुरू कर चुके थे। गड्ढे की मिट्टी हटाने के साथ ही पुलिस को भी बुला लिया था। ग्रामीणों ने सधे हुए हाथों से बच्ची को गड्ढे से बाहर निकाला। वह रो रही थी। सीने से लगाकर दुलारा, उसे तौलिया में लपेट लिया। कभी ग्रामीण तो कभी पुलिसकर्मी उसे चुपाने के लिए हाथों का झूला बनाकर झुलाते दिखे। उन अजनबियों ने बिटिया को अपना लिया मगर जन्म देने वालों ने नहीं.
जागरण संवाददाता, शाहजहांपुर। उफ...! देखना-पढ़ना तो छोड़िए। सोचने भर से कलेजा दहल जाएगा। किलकारियां भरने वाली नवजात बिटिया के माथे पर तिलक लगाया। नए कपड़े पहनाए...। इसके बाद जिंदा दफन कर दिया। जन्म देने वालों ने ही उसकी मौत का रास्ता तय कर दिया परंतु ईश्वर को यह क्रूर निर्णय स्वीकार नहीं था। उस नवजात बच्ची का एक हाथ किसी तरह गड्ढे के बाहर रह गया। उसमें हलचल देख ग्रामीणों ने पुलिस बुलाकर मिट्टी हटाई और अंदर से रोती निकली बच्ची को गले से लगा लिया। वह गड्ढे में दबी थी मगर, नाक व मुंह में मिट्टी नहीं भरी, शायद उसे दफन करने वालों के हाथ तो कांपे होंगे। ग्रामीण बताते हैं कि रविवार दोपहर एक बजे बहगुल नदी किनारे खेतों पर जाते समय किसी बच्चे के रोने की दबी आवाज आ रही थी। कौतूहलवश चारों ओर देखा मग, कोई नहीं दिखा। अचानक खेत किनारे गीली मिट्टी पर निगाह जाते ही एक हाथ दिखा। इसमें हलचल थी। उसके पास पहुंचने से स्पष्ट हो गया कि नवजात को कोई गड्ढे में दबा गया है। उसकी हथेली पर खून था। शायद पशु-पक्षी उसका मांस नोचना शुरू कर चुके थे। गड्ढे की मिट्टी हटाने के साथ ही पुलिस को भी बुला लिया था। ग्रामीणों ने सधे हुए हाथों से बच्ची को गड्ढे से बाहर निकाला। वह रो रही थी। सीने से लगाकर दुलारा, उसे तौलिया में लपेट लिया। कभी ग्रामीण तो कभी पुलिसकर्मी उसे चुपाने के लिए हाथों का झूला बनाकर झुलाते दिखे। उन अजनबियों ने बिटिया को अपना लिया मगर जन्म देने वालों ने नहीं...। ग्रामीणों में चर्चा रही कि किसी ने बेटी होने के कारण दफना दिया या अनचाही संतान होने के कारण ऐसी क्रूरता कर दी। पुलिसकर्मियों ने उसका सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्राथमिक उपचार कराया। इसके बाद राजकीय मेडिकल कालेज ले गए। वहां एसएनसीयू वार्ड में उसे आक्सीजन दी जा रही है। चिकित्सा प्रभारी डा. सजर ने बताया कि बच्ची 15 दिन की लग रही है। उसकी हथेली पर किसी के काटने से खून बह रहा था। उसके नाक व मुंह में मिट्टी नहीं भरी इसलिए सांस ले पा रही थी। ग्रामीणों ने बताया कि बच्ची ने नए कपड़े पहने थे। माथे पर तिलक भी लगा था। ऐसा प्रतीत हो रहा कि छठी या नामकरण के बाद उसे कोई दफना गया हो। इंस्पेक्टर गौरव त्यागी ने बताया कि घटनास्थल के आसपास के कई गांवों में सुराग तलाशे जा रहे हैं। ग्राम पंचायत भवनों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी निकलवाई जा रही है। बच्ची को जिंदा दफन करने वालों पर मुकदमा दर्ज करेंगे। उसकी हालत गंभीर बनी हुई है। चाइल्डलाइन की टीम भी उसे देखने मेडिकल कालेज पहुंची थी।
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