जागरण संपादकीय: सुस्त विकास दर और महंगाई की चुनौती, ब्याज दरें घटाने के विकल्पों पर देना होगा ध्यान

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जागरण संपादकीय: सुस्त विकास दर और महंगाई की चुनौती, ब्याज दरें घटाने के विकल्पों पर देना होगा ध्यान
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महंगाई के मुद्दे की बात करें तो यह अभी भी आरबीआई के सहजता वाले 4 प्रतिशत के दायरे से बाहर है। वैसे तो तमाम उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें अपेक्षाकृत नियंत्रित दायरे में हैं लेकिन सब्जियों एवं फलों की कीमतों ने महंगाई को हवा दे रखी है। पिछले वर्ष भी सर्दियों में फल-सब्जियों के दाम ऊंचे ही रहे थे और अभी भी ऊंचे बने हुए...

धर्मकीर्ति जोशी। बीते दिनों आए चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के मोर्चे पर सुस्ती के आंकड़ों ने हैरान करने का काम किया। इस दौरान जीडीपी में कमी के आसार तो लग रहे थे, लेकिन उसमें इतनी गिरावट व्यापक अनुमानों के उलट ही रही है। इस परिदृश्य से प्रभावित हुए बिना भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई ने शुक्रवार को अपनी मौद्रिक समीक्षा में नीतिगत ब्याज दरों को जिस प्रकार यथावत रखा है उससे यही संकेत मिलते हैं कि विकास की परवाह करने के साथ ही महंगाई को काबू में रखना रिजर्व...

4 प्रतिशत की वृद्धि कई संकेत देने वाली है। यह अर्थव्यवस्था में स्थायित्व को भी रेखांकित करती है। इस धीमेपन की कारणों की पड़ताल की जाए तो नीतिगत ब्याज दरों को 21 महीने से यथावत बनाए रखने वाला आरबीआई का रुख भी इसके लिए एक हद तक जिम्मेदार है। इसे लेकर कई स्तरों पर आवाज उठती रहती है। औद्योगिक गतिविधियों को गति देने के लिए ब्याज दरों में कमी की आवश्यकता को लेकर बहस लंबे समय से जारी है। हालांकि ब्याज दरों को लेकर आरबीआई के अपने तर्क हैं और चूंकि यह उसका ही विशेषाधिकार है तो परिस्थितियों का समग्र आकलन...

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